इस्लाम का इतिहास

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इस्लाम का इतिहास: आम तौर पर यह समझा जाता है कि 1400 वर्ष पुराना धर्म है, और इसके संस्थापक पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ हैं। लेकिन हक़ीक़त इससे अलग है। इस्लाम ईश्वर की ओर मनुष्य को दिया हुआ वो धर्म है जिसपर समर्पण करके मनुष्य ईश्वर का भक्त बन जाता है। आरम्भ से ही ईश्वर का एक ही धर्म है, जो पहले मनुष्य (आदम) से लेकर आज तक क़ायम है। ये मानना अज्ञानता है कि पैग़म्बर मुहम्मद इस्लाम के संस्थापक, बल्कि वह तो ईश्वर के आख़िरी रसूल (ईश्दूत) हैं। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने बाक़ी रसूलों की तरह लोगो को उसी सत्यधर्म की ओर बुलाया जो आदिकाल से एक ही रहा है। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ का मिशन इसी धर्म को पूरी तरह स्थापित करना था, ताकि मानवता के समक्ष इसका व्यवाहरिक रूप साक्षात रूप में आजाए।

अक्सर लोग पूछते हैं इस्लाम का इतिहास जानने के लिए किस पुस्तक का अध्यन किया जाये। इस्लाम का इतिहास जानने का अस्ल माध्यम ख़ुद इस्लाम का मूल ग्रन्थ ‘क़ुरआन’ है। क़ुरआन क़ायनात की शुरुआत से लेकर जीवन कैसे शुरू हुआ, मनुष्य को जीवन प्रदान करने के मक़सद से लेकर उसका आख़िरी ठिकाना क्या होगा इसपर पर ना केवल रौशनी दाल है बल्कि विस्तार में इसका मक़सद भी बताता है ताकि मनुष्य मार्दर्शन (हिदायत) हासिल करे। साथ ही क़ुरआन ये बात भी स्पष्ट करता है कि पृथ्वी के पहले मनुष्य हज़रत आदम का धर्म भी यही था। इस्लाम के मानने वालों को मुस्लिम कहा जाता है। आसान भाषा में मुस्लिम का अर्थ होता है – ईश्वर भक्त या Slave of God। इस्लाम के अनुयायियों के लिए क़ुरआन ने ‘मुस्लिम’ शब्द का प्रयोग हज़रत इब्राहिम के लिए किया है जो लगभग 4000 वर्ष पूर्व एक महान पैग़म्बर (सन्देष्टा) हुए थे। हज़रत आदम से लेकर पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ हज़ारों सालों के इस्लामी इतिहास में असंख्या पैग़म्बर (ईश्दूत) अलग अलग दौर में, अलग अलग क़ौमों में नियुक्त किया जाते रहे। ईश्वर की ओर से सारे पैग़म्बर एक का एक ही सन्देश मानवजाती को पहुंचाते रहे। ईश्वर के पैग़म्बर जिस भी क़ौम में नियुक्त किये जाते वह उस क़ौम की भाषा में ही ईश्वर का एक ही पैग़ाम लोगो को स्पष्ट कर देते ताकि लोगों को ये पैग़ाम बिलकुल साफ़ हो जाए। क़ुरआन में हमें 25 पैग़म्बरों के नाम का ज़िक्र है। सारे पैग़म्बरों ने एक ही सत्यधर्म का आह्वान किया, जिसका अलग-अलग भाषाओं में अलग-अलग नाम रहा और उसी एक सत्यधर्म को अरबी में इस्लाम कहते हैं।

इस्लाम का इतिहास समझने के लिए पहले इस्लाम को समझना बेहद ज़रूरी है। इस्लाम क्या है? इसे क़ुरआन ने बहुत गहराई से बताया है, परन्तु मैं इसे संक्षेप में बताने की कोशिश करूँगा:

1. इस्लाम बुनियादी तौर पर एकेश्वरवाद (तौहीद) की बात करता है। ईश्वर के व्यक्तित्व, उसकी सत्ता व प्रभुत्व, उसके अधिकारों (जैसे उपास्य, पूज्य, क़ानून बनाने के अधिकार, आदि) में किसी अन्य का सांझी (शरीक) न होना। पूरी क़ायनात (ब्रह्माण्ड) और अपार सृष्टि का ये महत्वपण व महानतम सत्य अदिकाल से हमेशा तक अपरर्वतमनीय, स्थायी और शाश्वत है ।

2. इस्लाम शब्द का अर्थ ‘शान्ति व सुरक्षा और ‘समर्पण’ है। इस प्रकार इस्लामी परिभाषा में इस्लाम नाम है, ईश्वर के समक्ष, मनुष्यों का पूर्ण आत्मसमर्पण; और इस आत्मसमर्पण के द्वारा व्यक्ति, समाज तथा मानवजाति के द्वारा ‘शान्ति व सुरक्षा’ की उपलब्धि का। यह अवस्था आरंभ काल से तथा मानवता के इतिहास हज़ारों वर्ष लंबे सफ़र तक, हमेशा मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता रही है। इस्लाम की वास्तविकता, एकेश्वरवाद की हक़ीक़त, इन्सानों से एकेश्वरवाद के तक़ाज़े, मनुष्य और ईश्वर के बीच अपेक्षित संबंध, इस जीवन के पश्चात (मरणोपरांत) जीवन की वास्तविकता आदि जानना एक शान्तिमय, सफल तथा समस्याओं, विडम्बनाओं व त्रासदियों से रहित जीवन बिताने के लिए हर युग में अनिवार्य रहा है; अतः ईश्वर ने हर युग में अपने सन्देष्टा (ईशदूत, नबी, रसूल, पैग़म्बर) नियुक्त करने (और उनमें से कुछ पर अपना ‘ईशग्रंथ’ अवतरित करने) का प्रावधान किया है। इस प्रक्रम का इतिहास, मानवजाति के पूरे इतिहास पर फैला हुआ है।

3. शब्द ‘धर्म’ को, इस्लाम के लिए कुरआन ने शब्द ‘दीन’ से अभिव्यक्त किया है। कुरआन में कुछ ईश-सन्देष्टाओं के हवाले से कहा गया है (42:13) कि ईश्वर ने उन्हें आदेश दिया कि वे ‘दीन’ को स्थापित (कायम) करें और इसमें भेद पैदा न करें, इसे (अनेकानेक धर्मों के रूप में) टुकड़े-टुकड़े न करें। इससे सिद्ध हुआ कि इस्लाम ‘दीन’ हमेशा से ही रहा है। उपरोक्त संदेष्टाओं में नूह (Noah) अलैहिस्सलाम का उल्लेख भी हुआ है और नूह (अलैहिस्सलाम) मानवजाति के इतिहास के आरंभिक काल के ईश-सन्देष्टा हैं। कुरआन की उपरोक्त आयत (42:13) से यह तथ्य सामने आता है कि असल ‘दीन’ (इस्लाम) में भेद, अन्तर, विभाजन, फ़र्क़ आदि करना सत्य-विरोधी है – जैसा कि बाद के ज़मानों में ईश-सन्देष्टाओं का आहवान व शिक्षाएं भुलाकर, या उनमें फेरबदल, कमी-बेशी, परिवर्तन-संशोधन करके इन्सानों ने अनेक विचारधाराओं व मान्यताओं के अन्तर्गत ‘बहुत से धर्म’ बना लिए।

मानव प्रकृति प्रथण दिवस से आज तक एक ही रही है। उसकी मूल प्रवृत्तियों में तथा उसकी मौलिक आध्यात्मिक, नैतिक, भौतिक आवश्यकताओं में कोई भी परिवर्तन नहीं आया है। अतः मानव का मूल धर्म भी मानवजाति के पूरे इतिहास में उसकी प्रकृति व प्रवृत्ति के ठीक अनुकूल ही होना चाहिए। इस्लाम इस कसौटी पर पूरा और खरा उतरता है। इसकी मूल धारणाएं, शिक्षाएं, आदेश, नियम … सबके सब मनुष्य की प्रवृत्ति व प्रकृति के अनुकूल हैं। अतः यही मानवजाति का आदिकालीन तथा शाश्वत धर्म है।

कुरआन ने कहीं भी पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सलल्‍लम) को ‘इस्लाम धर्म का प्रवर्तक’ नहीं कहा है। कुरआन में पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सलल्‍लम) का परिचय नबी (ईश्वरीय ज्ञान की ख़बर देने वाला), रसूल (मानवजाति की ओर भेजा गया), रहमतुल-लिल-आलमीन (सारे संसारों के लिए रहमत व साक्षात्‌ अनुकंपा, दया), हादी (सत्यपथ-प्रदर्शक)) आदि शब्दों से कराया है। स्वयं पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सललम) ने इस्लाम धर्म के ‘प्रवर्त’ होने का न दावा किया, न इस रूप में अपना परिचय कराया। आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सलल्‍ल्रम) के एक कथन के अनुसार ‘इस्लाम के भव्य भवन में एक ईंट की कमी रह गई थी, मेरे (ईशदूतत्व) द्वारा वह कमी पूरी हो गई और इस्लाम अपने अन्तिम रूप में सम्पूर्ण हो गया’ (आपके कथन का भावार्थ।) इससे सिद्ध हुआ कि आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सललम) इस्लाम धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। (इसका प्रवर्तक स्वयं अल्लाह है, न कि कोई भी पैग़म्बर, रसूल, नबी आदि)। और आप (सल्लल्लाहु अलैहि व सललम) ने उसी इस्लाम का आह्वान किया जिसका, इतिहास के हर चरण में दूसरे रसूलों ने किया था। इस प्रकार इस्लाम का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानवजाति और उसके बीच नियुक्त होने वाले असंख्य रसूलों के सिलसिले (श्रृंखला) का इतिहास।

यह ग़लतफ़हमी फैलने और फैलाने में, कि इस्लाम धर्म की उम्र कुल 1400 वर्ष है दो-ढाई सौ वर्ष पहले लगभग पूरी दुनिया पर छा जाने वाले यूरोपीय (विशेषतः ब्रिटिश) साम्राज्य की बड़ी भूमिका है। ये साम्राज्यी, जिस ईश-सन्देष्टा (पैग़म्बर) को मानते थे ख़ुद उसे ही अपने धर्म का प्रवर्तत बना दिया और उस पैग़म्बर के असल ईश्वरीय धर्म को बिगाड़ कर, एक नया धर्म उसी पैग़म्बर के नाम पर बना दिया। (ऐसा इसलिए किया कि पैगम्बर के आहवाहित असल ईश्वरीय धर्म के नियमों, आदेशों, नैतिक शिक्षाओं और हलाल-हराम के क़ानूनों की पकड़ से स्वतंत्र हो जाना चाहते थे, अतः वे ऐसे ही हो भी गए।) यही दशा इस्लाम की भी हो जाए, इसके लिए उन्होंने इस्लाम को “मुहम्मडन-इज़्म  का और मुस्लिमों को ‘मुहम्मडन्स का नाम दिया जिससे यह मान्यता बन जाए कि मुहम्मद “इस्लाम के प्रवर्तक  थे और इस प्रकार इस्लाम का इतिहास केवल 1400 वर्ष पुराना है। न कुरआन में, न हदीसों (पैगम्बर मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि व सलल्‍लम के कथनों) में, न इस्लामी इतिहास-साहित्य में, न अन्य इस्लामी साहित्य में … कहीं भी इस्लाम के लिए ‘मुहम्मडन-इज़्म’ शब्द और इस्लाम के अनुयायियों के लिए ‘मुहम्मडन’ शब्द प्रयुक्त हुआ है, लेकिन साम्राज्यों की सत्ता-शक्ति, शैक्षणिक तंत्र और मिशनरी-तंत्र के विशाल व व्यापक उपकरण द्वारा, उपरोक्त मिथ्या धारणा प्रचलित कर दी गई।

भारत के बाशिन्दों में इस दुष्प्रचार का कुछ प्रभाव भी पड़ा, और वे भी इस्लाम को ‘मुहम्मडन-इज़्म’ मान बैठे। ऐसा मानने में इस तथ्य का भी अपना योगदान रहा है कि यहाँ पहले से ही सिद्धार्थ गौतम बुद्ध जी, “बौद्ध धर्म”के;  और महावीर जैन जी “जैन धर्म” के ‘प्रवर्तक’ के रूप में सर्वपरिचित थे। इन ‘धर्मो! (वास्तव में ‘मतों)) का इतिहास लगभग पौने तीन हज़ार वर्ष पुराना है। इसी परिदृश्य में भारतवासियों में से कुछ ने पाश्चात्य साम्राज्यों की बातों (मुहम्मडन-इज़्म, और इस्लाम का इतिहास मात्र 1400 वर्ष की ग़लत अवधारणा) पर विश्वास कर लिया।

आगे पढ़ें: इस्लाम और इंसानियत! मुस्लिम या इंसान










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