विविधता में एकता ही हमारी शक्ति है

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जब भी हम हिंदुस्तान के बारे में सोचते हैं तो हमारे मन में एक बहुत ख़ूबसूरत छवि बनती है, एक ऐसी जगह जहाँ अलग अलग मतों को मानने वाले लोग एक दूसरे के साथ मिल कर रहते हैं। इन सबके रीति रिवाज अलग होने के बाद भी ये सब हिंदुस्तानी हैं। कोई भी धार्मिक शिक्षा आपस में लड़ने को बढ़ावा नहीं देती बल्कि हर मनुष्य का सम्मान करना सिखाती है। क्या हम अपनी धार्मिक शिक्षाओं को भूल चुके हैं? जो की हमे प्रेम और सद्भाव से रहना सिखाती हैं। विविधता में एकता ही हमारी शक्ति है जो की इस समय की सबसे बड़ी ज़रूरत भी है। जब कुछ अवसरवादी इस तक में  बैठे हैं के कैसे हमे लड़वा कर हम पर राज कर सकें। और ऐसे लोगो का सबसे बड़ा हथियार होता है धर्म।

यह धर्म के नाम पर इंसान से कुछ भी करवा लेते हैं, लेकिन इसके विपरीत कुछ ऐसे लोग भी हैं जिनके दिलों में आज भी प्यार और सद्भाव है और जो एक दूसरे की ढाल बन कर इस समाज के लिए एक सूंदर मिसाल पेश करते हैं। सच्चाई तो यह है कि आजकल कुछ भ्र्ष्ट लीडर लोगो को भड़का कर अपना उल्लू सीधा करते हैं, और लोग बिना सोचे समझे उस नफ़रत की आग में  झुलस जाते हैं, जो की उनके लिए भी और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी भयानक है। लेकिन लोगों को सच्चाई जानना बहुत ज़रूरी है, ताकि हम अपने समाज को एक अच्छा भविष्य दे सके। इस समाज के हर समझदार व्यक्ति को एक साथ मिल कर इन साज़िशों से लोगों को समाज को बचाना की ज़रुरत है, ताकि कोई भी चीज़ हमारे समाज की एकता को ख़राब न कर पाए।

जीवन का सबसे ज़रूरी नियम है सद्भाव, एक दूसरे के सहयोग से ही इस प्रकृति का संतुलन बना रहता है, पृथ्वी भी सतुलन बनाने के लिए और जीवन के लिए अन्य ग्रहों का सहारा लेती है। जैसे सूरज और चाँद जो जीवन के लिए बहुत ज़रूरी हैं। सद्भाव और सहयोग इंसान के लिए बहुत ज़रूरी है, आज के वक़्त में इंसान इस बात को नज़र अंदाज़ कर देता है उसे बस अपनी ज़रूरत की चीज़ों से लगाव रहने लगा है, अगर हम गहरायी से देखे तो हम ये समझ सकते हैं के बिना सहयोग के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। साम्प्रदायिक सहयोग वो वास्तविकता है जो हमारी नीव को मज़बूत बनाती है जो की एक बेहतर समाज के निर्माण में सहायक होता है।

जब कभी किसी भी समाज के अंदर परस्पर ख़ुद को दूसरे के मुक़ाबले बेहतर समझने का भाव आता है तो यह सहयोग की भावना कम होने लगती है। अगर हम भारत की बात करे तो यहाँ दो ऐसे समाज हैं जो एक दूसरे से ख़ुद को बहुत अलग मानते हैं – हिन्दू और मुस्लमान। कहने को तो मुस्लमान इस्लाम को मानते हैं और हिन्दू सनातन को, मसलमानों की किताब क़ुरआन है और हिन्दू वेदो को अपना धार्मिक ग्रन्थ मानते हैं। क़ुरआन अरबी भाषा में है और वेद संस्कृत में लिखे गए, ये दोनों एक ही ईश्वर को अलग अलग नाम से बुलाते हैं, कोई उसे ईश्वर कहता है तो कोई अल्लाह। लेकिन क्या ये मुमकिन है के हिन्दुओं को किसी अलग ईश्वर ने बनाया और मुसलमानो को अलग?

नहीं हम सबको को उस एक ईश्वर ने बनाया है जब ईश्वर एक है तो वो कैसे अलग अलग समुदायों को बना सकता है तो हमे ये समझना चाइये के  ईश्वर ने ये बटवारा नहीं किया और न ही उसने अलग अलग रास्तें अपनाने को कहा। सच तो ये है की धर्म का आधार एक है ये केवल भाषाएँ हैं  जो हर जगह अलग बोली जाती हैं जैसे कहीं पानी को जल कहा जाता है उसी तरह ईश्वर को भी कई नामों से पुकारा जाता है। संस्कृत में उसे  ईश्वर और अरबी में उसे अल्लाह कहा जाता है। लेकिन ये सभी नाम उस एक परमेश्वर के लिए हैं। अगर हम सब इतनी सी बात समझ जाए तो ये  सहयोग और प्रेम और बढ़ जायेगा, किसी के दिल में कोई भेद भाव या एक दूसरे से श्रेष्ठ होने का ख़्याल नहीं आएगा।

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