तक़िय्या - क्या इस्लाम झूठ बोलने की अनुमति देता है?

तक़िय्या – क्या इस्लाम झूठ बोलने की अनुमति देता है?

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तक़िय्या क्या होता है?

दावा: इस्लाम के आलोचकों द्वारा ये घोषणा की जाती है कि इस्लाम तक़िय्या सिखाता है, जो मुसलमानों को झूठ बोलने और हेरफेर करने के लिए अधिकृत करता है ताकि उनके धर्म का विस्तार हो सके।

तथ्यों की जांच

1. यह एक ज्ञात तथ्य है कि अल्लाह के अंतिम दूत, पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ को मक्का के लोगों (यहाँ तक कि उनके दुश्मन भी) द्वारा उन्हें अस-सादिक (صادق) और अल-अमीन (يمين) की उपाधि दी थी, जिसका अर्थ होता है – सत्यवादी और विश्वसनीय है। यहां तक ​​कि अबू जहल समेत उनके सबसे बड़े दुश्मन भी उन्हें अस-सादिक और अल-अमीन के रूप में स्वीकार करते हैं। [1]

2. मज़ाक़ में भी झूठ बोलने की चेतावनी इस्लाम ने हमेशा सत्य बोलने का हुक्म दिया और मज़ाक़ में भी झूठ बोलने से मना किया। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने हुक्म कि लोगों को हंसाने के लिए भी झूठ बोलना मना है। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने फ़रमाया: लानत है उसपर जो लोगो को हँसाने के झूठ बोले। [2]

3.सत्य बोलने का आदेश: इस्लाम सच बोलने का हुक्म देता है और झूठ बोलना से रोकता है; और हर परिस्थिति में सत्य और न्याय का पालन करने पर ज़ोर देता है – तब भी जब ख़ुद के ख़िलाफ़ गवाही देना पड़े। [3]

4. तक़िय्या शब्द क़ुरआन या पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की सहीह हदीस में एक बार भी नहीं आया है।

5. यह एक जाना माना सर्वविदित तथ्य है, यहां तक ​​कि जब मक्का में सबसे अधिक प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, तब भी मुसलमानों ने अपने धर्म को नहीं छिपाया और लगातार बारह साल तक अत्याचार सहते रहे। अगर तक़िय्या एक इस्लामी विश्वास होता तो यह युग इसका उपयोग करने का सबसे अच्छा समय था।

6. इस्लाम सच्चाई को झूठ के साथ न जोड़ने का निर्देश देता है और न ही सच्चाई को छुपाने का आदेश है जबकि आप सच्चाई जानते हों। [4]

7. इस्लाम मज़बूती के साथ सत्य और न्याय पर क़ायम रहने का हुक्म देता है, फिर चाहे वह तुम्हारे ख़ुद के ख़िलाफ़ हो, चाहे तुम्हारे माता-पिता के ख़िलाफ़ हो,चाहे तुम्हारे रिश्तेदारों के ख़िलाफ़ हो, चाहे वह अमीर हो या ग़रीब।

क़ुरआन कहता है, “ऐ ईमानवालों मज़बूती के साथ इन्साफ़ पर क़ायम रहो और ख़ुदा के लये गवाही दो अगरचे (ये गवाही) ख़ुद तुम्हारे या तुम्हारे मॉ बाप या क़राबतदारों के लिए खिलाफ़ (ही क्यो) न हो ख्वाह मालदार हो या मोहताज (क्योंकि) ख़ुदा तो (तुम्हारी बनिस्बत) उनपर ज्यादा मेहरबान है तो तुम (हक़ से) कतराने में ख्वाहिशे नफ़सियानी की पैरवी न करो और अगर घुमा फिरा के गवाही दोगे या बिल्कुल इन्कार करोगे तो (याद रहे जैसी करनी वैसी भरनी क्योंकि) जो कुछ तुम करते हो ख़ुद उससे ख़ूब वाक़िफ़ है” [5]

8. यहां तक ​​की पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ के उस समय के एक कट्टर दुश्मन अबू सुफ़यान भी हेराक्लियस सीज़र (Heraclius Caesar) के पूछे जाने पर कहते हैं की हमने पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ को एक भी शपथ का उल्लंघन करते नहीं देखा।

9. पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने फरमाया बड़े पापों में सबसे बड़े पाप ये हैं – ईश्वर का साझी ठहराना, माता-पिता से दुरव्यवहार करना और झूठी गवाही देना। [6] पवित्र क़ुरआन भी इन कथनों की पुष्टि करता है। [7]

इस्लाम में तक़िय्या जैसी आस्था की कोई गुंजाईश नहीं। इस्लाम हर मामले में सच की पैरवी करने की बात करता है। उम्मीद है तक़िय्या पर आपकी ग़लतफ़हमी दूर हुयी होगी।

Ref:

[1] दलाइल अल-नबुव्वह, बैहक़ी, दार अल-क़ुतुब अल-इल्मियया
[2] सुनन अबू दावूद 4990
[3] क़ुरआन 2:10-20; 4:69, 135; 5:8; 9:119; 33:35; 61:2-3.
[4] क़ुरआन 2:42.
[5] क़ुरआन 4:135
[6] मुवत्ता, किताब 8.
[7] मुस्लिम, किताब 1.

Read this article in English http://islamshantihai.com/what-is-taqiyya-in-islam/

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