सत्य की ख़ोज

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हर मनुष्य ईश्वर की इच्छानुसार अलग अलग समुदाय में पैदा हुआ है, लेकिन ईश्वर ने इस भू लोक को हर मनुष्य की परीक्षा के लिए बनाया है, और साथ ही बुद्धि भी दे दी, ताकि हम अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें। दुनिया के छोटे मोटे काम हम आंखें बंद करके नहीं करते, यहां तक कि एक चप्पल खरीदने जाएंगे, तो भी क्वालिटी चेक करेंगे। लेकिन धर्म जैसी महान बुनियादी चीज़ हम कैसे आंखें बंद कर के ले सकते हैं। निःसंदेह सत्य केवल एक है, ऐसा कभी नहीं हो सकता कि ये भी ठीक है और वो भी ठीक है, उस सूरत में जबकि दोनों चीजें बिल्कुल विरोधाभास में हों। उदाहरण के तौर पर, सत्य ये है, कि 2 और 2 चार होते हैं, लेकिन कोई 5 कहे, और कहे कि इसे भी सत्य मान लिया जाए, तो ये ग़लत और अतार्किक बात होगी। हां ये हो सकता है, कि अगर कोई अंधी आस्था में 5 मान रहा है, तो मानवता ये है, कि 4 मानने वाला उसे दलील के साथ समझाए बुझाए, उसे सही रास्ता दिखाने का प्रयास करे, पर वो फिर भी अड़ा रहे, तो उसके बाद उससे ज़बरदस्ती ना मनवाए। यही अपने पर्सनल जीवन में अपनी मर्ज़ी की बात मानने की आज़ादी है जब तक उससे दूसरों को नुक्सान ना हो। यही आज़ादी ईश्वर ने यहां इस भू लोक में दी है, लेकिन साथ ही बुद्धि और विवेक भी दे दिए, जिसके विषय में मृत्यु के पश्चात सवाल होगा। तो जैसे मनुष्य 2 और 2 चार मानता है, और कोई 5 भी माने, तो उस पर कोई ज़बरदस्ती नहीं, लेकिन मानवता का तकाज़ा ये है, कि 4 और 5 मानने वाला अपनी बात पर खुद बुद्धि से जांच पड़ताल करे, और फिर चूंकि 4 मानने वाले के लिए 5 मानने वाला और 5 मानने वाले के लिए 4 मानने वाला गलत है, तो अपना भाई समझकर उसको समझाए, ताकि सत्य सामने आ सके। ऐसा नहीं होना चाहिए, कि जो जहां है वहीं खुश रहे, अगर ऐसा होगा, तो हम विकास और सत्य की ओर ना चल कर अपने दायरे में सीमित हो जाएंगे। और फिर सत्य से अनभिज्ञ लोग सत्य के प्रकाश को छोड़ असत्य के अंधेरों में रहेंगे, जिसका असर उनके आने वाले जीवन पर तो पड़ेगा ही, लेकिन इस दुनिया पर भी पड़ेगा। बल्कि सत्य तो ये है कि जिन को सत्य पता है उन्होंने अपनी ड्यूटी पूरी ना की, तो ईश्वर अंत के दिन उनसे भी सवाल करेगा, और असत्य के पैरोकार अगर सत्य से अनभिज्ञ रहकर चले गए, तो वही लोग ईश्वर के समक्ष उन सत्य के पैरोकारों के गिरेबान पकड़ लेंगे, जो सत्य को केवल अपने तक सीमित रख कर बैठे था। क्योंकि यदि वे उसको सत्य मानते हैं, और दूसरों को ना बताएं, तो ये उनकी खुदगर्ज़ी और स्वार्थ हो जायेगा। हकीकत में सत्य का मानने वाला उसको स्वयं तक सीमित नहीं रख सकता। अगर ऐसा है, तो या तो उसका खुद उस सत्य पर विश्वास या उसका ज्ञान नहीं है, या फिर उसको भी पता है कि उसके पास असत्य है।

बाकी ईश्वर बेहतर जानने वाला है।

तो हर मनुष्य अपनी समझ में आई बात पर अमल करने के लिए आज़ाद है, लेकिन हर सत्य के पैरोकार की मानवता के नाते ये ज़िम्मेदारी बनती है कि यदि वह समझता है कि वह असत्य पर चलने वाला उस पर चल कर परलोक की तबाही की ओर जा रहा है, तो जो एक तेज़ चलती ट्रेन रूपी आफत अर्थात् मृत्यु उस असत्य के पैरोकार की ओर बढ़ रही है, उसको उससे बचा ले। अन्यथा ईश्वर के समक्ष वो स्वयं भी जवाबदेह होगा, और उस आफत की चपेट में आने वाला यदि सत्य से अनभिज्ञ रहा तो वो भी अंत के दिन उस मनुष्य का गिरेबान नहीं छोड़ेगा, जिस के पास सत्य था और जो उस असत्य के पैरोकार तक पहुंचने की शक्ति रखता था। लेकिन इसके उलट यदि मानवता के तकाज़ों को पूरा करते हुए वह सत्य का पैरोकार अपने भाई की फिक्र करते हुए उस तक वो सत्य बात पहुंचा देता है, तो उसको दिली सुकून तो हासिल होगा ही, कि वह अपनी ड्यूटी पूरी कर चुका, बल्कि वह अपने भाई की ज़िम्मेदारी से भी बरी हो जाएगा, जो मानवता का तकाज़ा है। फिर चाहे उसका वही भाई उस पर पत्थर ही क्यों ना बरसा दे, उसका ईनाम निसंदेह उस ईश्वर के ज़िम्मे है, जिसने उसको प्रेम और मानवता सिखाई है। इसी बुनियाद पर तो मुहम्मद साहब स० ने भी ताईफ में ज़ालिमों के हाथों पत्थर खाने के बाद भी उन ज़ालिमों के लिए ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना की थी। यही सत्य के पैरोकारों की ज़िम्मेदारी है, पर उसके बाद अगर कोई मनुष्य बिना सत्य की तलाश किए अपनी मनमर्जी से जिधर भी चलता है, तो उसका मामला ईश्वर के ज़िम्मे है। निसंदेह हर मनुष्य वही काटेगा, जो बोएगा।

और अंत में बस यही कहूंगा कि…

एकं सत विप्रः बहुधा वदंति।
अर्थात्
सत्य केवल एक है, संत उसे भिन्न भिन्न नामों से जानते हैं,

वासुधेव कुटुंबकम्।
समस्त मानवजाति एक परिवार है,

और मैं चाहता हूं, कि जो इस जीवन में भाई जैसे हैं, और एक दूसरे को भाई मानते हैं, वो उस कभी ना खत्म होने वाले अनंतकाल के जीवन अर्थात् परलोक में भी भाई बनकर रहें, और इसकी कोशिश जारी है…

वह एक और अकेला परमेश्वर जिसका कोई साझी नहीं, जिसकी कोई प्रतिमा नहीं, जिसके सिवा किसी का पूजा उपासना का अधिकार नहीं, हम उससे प्रार्थना करते हैं कि वह हम सब को सतमार्ग की ओर अग्रसर करे, और हमें बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करके सत्य बात स्वीकार करने की तौफ़ीक अता फरमाए…

आमीन (तथास्तु)

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I'm a Writer, trying to deliver the truth with meaningful words.

Muhammad Amir Ansari
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