राष्ट्रवाद: इस्लाम की नज़र में

Latest Misconceptions About Islam Muhammad Amir Ansari
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राष्ट्रवाद! इस लफ्ज़ का ख्याल आते ही आम तौर पर ज़हन में देशभक्ति के एक कट्टरवादी रवैये की तस्वीर कौंध जाती है, और ऐसा इसलिए है क्योंकि जब इस मुद्दे को सामने लाया जाता है तो उसमें देशभक्ति की कट्टरता झलकती है। आम तौर पर लोग राष्ट्रवाद और देशप्रेम को एक ही चीज़ समझते हैं, हालांकि इन दोनों चीज़ों में ज़मीन आसमान का फर्क है। इसका फर्क तो मैं समझाऊंगा, लेकिन मेरा टॉपिक इस्लाम और राष्ट्रवाद है, इसलिए मैं बात यहां से शुरू करूंगा कि इस्लाम इन मुद्दों पर किस हद तक हमारा मार्गदर्शन करता है, और इस्लाम इन मुद्दों के बारे में क्या तसव्वुर पेश करता है, क्योंकि खुद मुस्लिमों के दरमियान ही इन मुद्दों पर अलग अलग तरह के विचार पाए जाते हैं, और हर इंसान को अपने विचार रखने का अधिकार है। तो मैंने इन्हें जहां तक समझा है मैं अपने वो विचार यहां रखूंगा।

सबसे पहले देशप्रेम की बात शुरू करते हैं। देश से प्रेम होना फितरी (प्राकृतिक) बात है, ये हर इंसान के दिल में होता है। इस्लाम क्योंकि पूरी इंसानियत की बात करता है, इसलिए इस्लाम में हमें इस मुद्दे पर ज़्यादा ज़िक्र नहीं मिलता। पर ये बात हकीकत है कि इंसान जहां पैदा होता है वहां से मुहब्बत करता है। जो लोग अपने शहर से दूर रहते हैं, वो जानते हैं कि अपने शहर की मुहब्बत क्या होती है। यही मामला देश का है, इंसान अगर शहर या देश से बाहर रह रहा हो, और उसे वहां अपना कोई शहरवासी या देशवासी मिल जाए, तो उससे बात करने का अहसास ही अलग होता है। तो इंसान जहां पैदा हुआ होता है वहां से उसे मुहब्बत होती ही है। मुहम्मद साहब स० पर जब मक्के में ज़ुल्म किया गया तो उन्हें मजबूरन मक्का छोड़ना पड़ा, पर उन्होंने जाते वक़्त एक पहाड़ी पर खड़े होकर मक्का की तरफ देख कर कहा था कि “ऐ मेरे वतन मक्का! अगर मेरे लोग मुझे निकलने पर मजबूर ना करते तो मैं तुझे कभी छोड़कर नहीं जाता।” ये मुहब्बत ही तो थी, इस मुहब्बत का होना फितरी (प्राकृतिक) बात है। तो देशप्रेम के मसले का इस्लाम के उसूलों से कोई ताल्लुक नहीं, इस्लाम ने इसे मुद्दा ही नहीं बनाया। मुस्लिमों के आपसी विचारों में विभेद इस वजह से शुरू होता है क्योंकि वो राष्ट्रवाद और देशप्रेम में फर्क नहीं करते। अब ये मुहब्बत कहां तक सिर्फ मुहब्बत बचती है, और किस हद पर जाकर ये कट्टर राष्ट्रवाद का रूप ले लेती है, उसको मैं अब आगे ज़िक्र करूंगा।

राष्ट्रवाद एक कट्टरवादी फलसफा है, राष्ट्रवाद का मतलब होता है देश की अंधी भक्ति करना, और हर हाल में अपने देश को बाकी से ऊंचा समझ कर बाकी को अपने से नीचा समझना! इस्लाम इंसानों में पंथ, जाति, देश, नस्ल की बुनियाद पर ऊंच नीच की इजाज़त नहीं देता, वो कहता है कि सब एक माता पिता की संतान हैं, अगर कोई ऊंचा है तो वो अपने कर्मों से ऊंचा है। तो हर हाल में स्वयं को ऊंचा समझ कर बाकी को नीचा समझना इस्लाम की शिक्षा नहीं है, बल्कि इस्लाम इसका धुर विरोधी है। क्योंकि मुहम्मद साहब स० ने खुद अरब के बारे में कहा था कि ना किसी अरबी को अजमी पर बड़ाई हासिल है और ना किसी अजमी को अरबी पर कोई बड़ाई हासिल है। अजमी का मतलब होता है अरब से बाहर वाला! तो इस फलसफे को तो उन्होंने इसी बात से उखाड़ फेंका था। लेकिन यहां एक सवाल पैदा होता है कि फिर मुस्लिम अपने देश के लिए क्या कर सकता है? तो भाईयों! मैंने जैसा आपको बताया कि देशप्रेम फितरी (प्राकृतिक) बात है, तो प्रेम में आदमी क्या करता है? मुस्लिम ये कर सकता है कि उसकी सरज़मीन पर कोई ज़ुल्म से हाथ डाले तो वो अपनी जान से बेपरवाह होकर उस ज़ुल्म को अल्लाह के हुक्म से उखाड़ के फेंक सकता है, क्योंकि इस्लाम ने ही हमें शिक्षा दी है कि ज़ुल्म होते देखो और तुम में ताकत है तो उसे अपने हाथ से रोको। लेकिन इसलाम सिर्फ यहां तक बात नहीं करता, इस्लाम इससे आगे की बात करता है।

मिसाल के तौर पर, मान लीजिए मेरा एक सगा भाई है, मैं उससे बोहोत प्रेम करता हूं, उस पर कोई ज़ुल्म से हाथ डालेगा तो मैं अपनी ताकत के मुताबिक़ हर हद तक उसका विरोध करूंगा, क्योंकि करीबी रिश्तों से इंसान को मुहब्बत होती ही है, ऐसे ही अपने शहर और देश से भी मुहब्बत होती है। लेकिन इसलाम ने ही हमें ये शिक्षा भी दी है कि अगर तुम्हारा भाई किसी और मासूम पर ज़ुल्म से हाथ डाले, तो फिर तुम्हें अपने भाई का भी साथ नहीं देना, तुम्हें साथ उसका देना है जो सत्य पर हो, इंसाफ पर हो। बस इसी बात पर आकर देशप्रेम तो ज़िंदा रहता है, लेकिन राष्ट्रवाद धाराशायी हो जाता है, क्योंकि राष्ट्रवाद का अर्थ ही ये होता है कि अपना देश सही गलत कुछ भी करे, चाहे दूसरों पर ज़ुल्म शुरू कर दे, तुम्हें अपने देश को ही ऊंचा समझना है, और उसी का साथ देना है। आम मुस्लिमों की तो मैं बात ही नहीं कर रहा, पर एक सच्चा मुस्लिम ज़ुल्म में अपने सगे भाई और परिवार का साथ नहीं दे सकता, तो ज़ुल्म करने में देश का साथ देने की कोई तुक ही नहीं बनती। इसलिए इस्लाम का ऐसे कट्टर राष्ट्रवाद से कोई लेना देना नहीं, लेकिन देशप्रेम और अपने वतन से वफादारी हर इंसान के अंदर फितरी (प्राकृतिक) तौर पर होती है, मुस्लिमों में भी होती है। जान बूझ कर बेवजह अपने वतन से गद्दारी करने वाला इंसान वैसे ही नैतिक मूल्यों से ख़ाली है, उसके मुस्लिम या गैर मुस्लिम होने पर क्या बात की जा सकती है? तो इस्लाम हर ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने की शिक्षा देता है, फिर चाहे निशाने पर अपना भाई या अपना परिवार ही क्यों ना हो। पर अगर आप चाहते हैं कि हमारे राष्ट्र और इसके अच्छे लोगों से हमारे प्रेम की वजह से मैं आपको राष्ट्रवाद की एक छोटी और थोड़ी पॉज़िटिव परिभाषा बताऊं, तो मैं कहूंगा:

राष्ट्रवाद ये नहीं कि हम देशविरोधी चीज़ों का हिस्सा बने, बल्कि राष्ट्रवाद ये है कि हम ऐसा कार्यों का हिस्सा बनने जिसमें देश के सारे नागरिकों के लिए भलाई, और इंसाफ़ हो, साथ ही वह कार्य भी करें जिससे हमारी मात्रभूमि उन्नति करे, जय हिन्द!

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Muhammad Amir Ansari
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