musalman qurbani kyun karte hain

कुर्बानी क्यों करते हैं मुसलमान?

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कुर्बानी क्यों करते हैं मुसलमान?

कुर्बानी की हकीकत

जैसा कि आप सब लोग जानते हैं, ईद उल अज़हा करीब है, और इस ईद पर मुस्लिमों की तरफ से जानवर की कुर्बानी दी जाती है, तो इस ईद से पहले अकसर कुछ लोगों की तरफ से इस पर आपत्ति उठना शुरू हो जाती है कि मुसलमान कुर्बानी क्यों करते हैं? ज़ाहिर है उनमें से कुछ लोगों का मकसद इसके पीछे की वजह जानना होता है, पर कुछ लोगों का मकसद सिर्फ और सिर्फ जीवहत्या के नाम पर नफरत फैलाना और एक कम्युनिटी को बदनाम करना होता है।

मैं यहां ज़्यादा लंबी चौड़ी बात नहीं सिर्फ तीन तरह के लोगों से तीन बातें कहना चाहूँगा, जिनमे से तीसरी बात मुस्लिमों से कहूँगा, पहली दो बातें बाकी के लोगों से कहूंगा, और उसके बाद ज़रूरी नहीं कि आप मेरी बात से सहमत हों, आप विरोधाभास रख सकते हैं। पर मुस्लिम होने के नाते इस्लाम के किसी भी मसले पर गलतफहमी को दूर करने को मैं अपनी ज़िम्मेदारी समझता हूँ, और जब मैं इस्लाम का नाम लूँ, तो मेरा मतलब “असल इस्लाम” से होगा, मुस्लिमों से नहीं।

भाईयों, सबसे पहले तो ये जान लें कि आप इस बात को कहते समय एक ऐसी शरीयत और कानून से रूबरू हैं, जो अपने आप में इकलौता ऐसा दीन है जो गरीबों और मिसकीनों को पैसा देने को फ़र्ज़ कहता है। यहाँ बात ये नहीं है कि दान देना अच्छी बात है, यहाँ बात ये है कि देना ही पड़ेगा, नहीं तो इस्लाम की नज़र में गुनहगार हो जाएंगे। यहाँ तक कि कुरआन ने बता दिया है कि तुम्हारी कमाईयों में गरीबों का हक़ ईश्वर ने रखा है। देखें:

और उन के मालों में माँगने वाले और धनहीन का हक़ था ★क़ुरआन (51:19)

तो इस्लाम की ये बुनियादी बात मैंने यहां साफ कर दी, इसलिए कुर्बानी पर ये सवाल उठाना अपने आप में बेवकूफी और जहालत की बात है, क्योंकि दान करने को पहले ही इस्लाम में फ़र्ज़ (ज़रूरी) कर दिया गया है, ये काम सच्चे मुस्लिम पहले ही करते हैं। याद रखें, “इस्लाम में दान देना सिर्फ अच्छा काम नहीं बल्कि फ़र्ज़ है।”

दूसरी बात उन भाइयों से जिन्हे इस कुर्बानी वाली ईद से ही प्रॉब्लम है, और वो जीव हत्या का रोना रोते हैं और कहते हैं कि मुसलमान कुर्बानी क्यों करते हैं?। अब ये न कहें कि हमें ईद से नहीं कुर्बानी से प्रॉब्लम है, तो साफ साफ बात ये है कि ये ईद कुर्बानी पर ही केंद्रित है, बाकि बिना कुर्बानी वाली इससे लगभग दो महीने दस दिन पहले निकल चुकी होती है, इस मामले में मेरी तरफ से कोई मीठी बात आपको सुनने को नहीं मिलेगी। हमारे वो भाई पहले जीव हत्या के मसले को साफ करें कि जीव हत्या की हकीकत क्या है। जब तक जीव हत्या का मसला साफ नहीं होगा, ये ईद समझ नहीं आएगी और मुसलमान कुर्बानी क्यों करते हैं ये भी समझ नहीं आएगा?

अगर आपने छोटे बच्चों की विज्ञान की पुस्तक भी पढ़ी होगी तो आपको समझ आ जाएगा कि पेड़ पौधे भी जीव होते हैं, तो जीव हत्या तो सभी करते हैं, हां ये बात अलग है कि पेड़ पौधों और जानवर में फर्क होता है, ये हम मानते हैं, लेकिन अगर बात जीव हत्या की ही हो, तो शाकाहारी लोग ज़्यादा जीव हत्या करते हैं क्योंकि शाकाहार में मांसाहार से कहीं ज़्यादा जीव खत्म होते हैं, कैसे? आप जानते हैं कि एग्रीकल्चर इंडस्ट्री में क्या होता है, कितने जीव मारे जाते हैं तो फसल तैयार होती है, ये बेवकूफी की बात होगी कि उनका तड़पना अगर आपको नहीं दिखता तो वहां जीव हत्या नहीं हो रही, वहां तो असंख्य जीव मरते हैं, मांसाहार में तो एक जीव कई लोगों के लिए काफी हो जाता है। ये सिस्टम ईश्वर ने ऐसे ही रखा है कि जीव जीव को ही खा सकता है, निर्जीव को नहीं खा सकता। तो पहले तो ये तय करें कि अगर बात जीव हत्या की ही है, तो शाकाहारी लोग सबसे ज़्यादा जीव हत्या करते हैं, वो भी उन करोड़ों जीवों की, जिनको वो खाते ही नहीं, बस पेस्टीसाइड्स के ज़रिए मार देते हैं। तो पहले तो विरोध की भाषा बदलिए। जिस चीज़ को खाने की इजाज़त ईश्वर ने दी है, वो हत्या नहीं कहलाएगी, वरना इससे कोई नहीं बचेगा, बल्कि शाकाहारी तो और बड़े हत्यारे सिद्ध हो जाएंगे। ईश्वर ने शेर को मांसाहारी बनाया, हाथी को शाकाहारी बनाया, और मनुष्य को मिश्रहारी बनाया, ये सब उसने तय किया है, मनुष्य प्राकृतिक रूप से मिश्रहारी है, उसके शरीर की बनावट इसको सिद्ध करती है। 

1- मांसाहारी जानवरों के पूरे विकसित कैनाइन टीथ (नुकीले दांत) होते हैं, जबकि शाकाहारी जानवरों के नहीं होते, और मनुष्य के दांतों की बनावट इनके बीच में होती है।

2- मांसाहारी जानवरों के जबड़ों की मूवमेंट वर्टिकल (ऊपर नीचे) होती है, शाकाहारी जानवरों की हॉरिजॉन्टल (दाएं बाएं) होती है, जबकि मनुष्य के जबड़े दोनों और चलते हैं।

3- मांसाहारी जानवरों के मुंह में एसिडिक एंजाइम्स बनते हैं, शाकाहरी जानवरों के मुंह में बेसिक एंजाइम्स बनते हैं, जबकि मनुष्य के मुंह में दोनों तरह के एंजाइम्स बनते हैं।

4- मांसाहारी जानवरों के बच्चों की आंखें पैदाइश पर बंद होती हैं, और लगभग 1 हफ्ते बाद खुलती हैं, शाकाहारी जानवरों के बच्चों की आंखें पूरी तरह खुली होती है, और मनुष्य के का बच्चा कम रोशनी में खोलता और अधिक रोशनी में बंद रखता है।

इन सब पॉइंट्स से पता चलता है कि मनुष्य इन दोनों के दरमियान की प्रजाति है, इसको ईश्वर ने ऐसा ही बनाया है। और इनको खाने की इजाज़त उस ईश्वर ने ही दी है, तो उसी का नाम लेकर हम इन्हें खाते हैं। अब जो लोग जीव हत्या पर सवाल उठाते हैं उनको ग्रंथों से कुछ सबूत यहां रखूंगा।

विधान को जानने वाला द्विज बिना आपत्तिकाल में पड़े विधिरहित मांस को ना खाए। मनुस्मृति (5:33)

ब्राह्मण मंत्रों से असंस्कृत मांस को कदापि ना खाए, मंत्रों से संस्कृत मांस को ही सदा विधिपूर्वक खाए। मनुस्मृति (5:36)

विधि क्या है, विधि वही है कि इनको खाने की इजाज़त ईश्वर ने हमें दी है, ईश्वर के बताए तरीके और उसके नाम से उनको खाया जाएगा, इसी लिए मुस्लिम जब जानवर को ज़िबह करते हैं, तो एक ख़ास विधि के साथ अल्लाह का नाम उस पर लेते हैं, अगर उस ख़ास विधि के साथ उस पर अल्लाह का नाम नहीं लिया तो वो जानवर खाना मुस्लिम के लिए हलाल नहीं होगा, फिर वो वाकई हत्या हो जाएगी।

तो जानने वाले इस बात को जानते हैं, इसीलिए हिंदुस्तान में भी 35% शाकाहारी हैं, 65% मांसाहारी हैं, इन 65% में कौन कौन होंगे, बताने की ज़रूरत नहीं। हिन्दुस्तान के कई मंदिरों पर कितनी बलियां दी जाती है, ये किसी से ढकी छुपी बात नहीं है।

इसको मसला सिर्फ और सिर्फ एक कम्युनिटी के खिलाफ नफरत फ़ैलाने के लिए बनाया जाता है। बाकी कोई मनुष्य पसंद के ऐतबार से शाकाहारी हो सकता है, उसे मांस अच्छा नहीं लगता, कोई मसला नहीं, बोहोत से मुस्लिम भी शुद्ध शाकाहारी होते हैं।

मनुस्मृति से कुछ और मंत्र देखिए:

प्रजापति ने जीव का सब कुछ खाने योग्य ठहराया है, सभी स्थावर (फल, वनस्पति आदि) तथा जंगम (पशु, पक्षी, जलचर आदि) जीवों के भोजन हैं। ★मनुस्मृति (5:28)

प्रतिदिन भी खाने योग्य जीवों को खाने वाला दोषी नहीं होता, क्योंकि सृष्टा ही ने भक्ष्य (खाने योग्य) तथा भक्षक दोनों ही जीवों को बनाया है। ★मनुस्मृति (5:30)

स्वामी विवेकानन्द ने तो हिन्दुओं को गोश्त खाने का सुझाव दिया है, जब उनसे पूछा गया कि भारतीय इतिहास का सबसे बेहतरीन दौर कौन सा था, तो उन्होंने कहा कि वो वैदिक काल था, जब पांच ब्राह्मण मिल कर एक गाय को चट कर जाते थे। उन्होंने हिन्दुओं को सुझाव दिया कि अगर हिन्दुओं को पूरी दुनिया की ताकतों से टकराना है, और आज के दौर में ताकतवर राष्ट्रों में अपनी जगह बनाना है, तो उनको जानवरों का गोश्त खाना चाहिए। ★स्वामी विवेकानंद – अ बायोग्राफी बाई स्वामी निखिलानंद, (पेज-53)

अगर इतनी बातों से भी किसी को जीव हत्या का मसला साफ नहीं हुआ हो, तो वो शख्स अपने आस पास जे माहौल द्वारा बनाए हुए फ़र्ज़ी जज़्बातों को अपनी अक्ल से ऊपर रखे हुए है, उसका कोई इलाज नहीं।

वापस कुर्बानी की तरफ आते हैं – जानते हैं मुसलमान कुर्बानी क्यों करते हैं?

आईये जानते हैं कि मुसलमान कुर्बानी क्यों करते हैं? कुर्बानी के गोश्त के तीन हिस्से होते हैं, एक अपने लिए, एक अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के लिए। और तीसरा हिस्सा गरीबों के लिए होता है, वो लोग जो अक्सर इस पौष्टिक आहार से दूर रहते हैं और उन्हें ये कमी से मिल पाता है, उनको भी अपने साथ इसमें शामिल किया जाता है, और इस त्यौहार को इस तरह मुहब्बत से आर्थिक तौर पर मजबूत व कमज़ोर सब लोग मिल कर मनाते हैं!

तीसरी और आखिरी बात मुस्लिम भाईयों से कहना चाहूंगा कि भाईयों! ये कुर्बानी आपके लिए अल्लाह की तरफ से एक यादध्यानी है कि आप अपनी जान, अपने माल, अपनी औलाद, अपनी सबसे पसंदीदा चीज़ और अपना सब कुछ उस तमाम जहानों के मालिक अल्लाह की राह में कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार होने चाहिए। और वो राह ए हक़ क्या है? वो ये है कि उस मालिक का पैगाम जो इंसानियत के लिए है, उस पर खुद अमल करना और उसको तमाम इंसानियत तक पहुंचाना। अच्छाई, सच्चाई, हक़ और मुहब्बत के साथ और बुराई, झूठ, नफरत और ज़ुल्म के खिलाफ खड़े रहना, और इस पर सख्ती से डटे रहना, फिर चाहे उस में आपकी जान ही क्यूँ न चली जाए। क्योंकि:

बेशक (हम) अल्लाह के हैं और उसी की तरफ लौटना है! ★क़ुरआन (2:156)

ये कुर्बानी इस बात की यादध्यानी है कि हक़ के लिए आप अपनी हर अच्छी से अच्छी चीज़, खुद की जान, अपना माल, अपना सब कुछ दांव पर लगाने को हमेशा बिना किसी खौफ के तैयार हों, आपके कदम कहीं लड़खड़ा नहीं जाएं। आप अच्छाई पर नरम दिल हों, और बुराई के खिलाफ ज़बरदस्त हों, फिर सामने चाहे जो भी हो।

असल में तो वो ही सही ईमान वाले होंगे जिन पर न कोई खौफ होगा न कोई गम होगा, जो अल्लाह की राह में अच्छाई के साथ और बुराई के खिलाफ एक आवाज़ पर लब्बैक (हाज़िर हूँ) कहते हैं, फिर चाहे बुराई कितनी ही बड़ी व खतरनाक ही क्यूँ न हो। हमारी गर्दन कट तो सकती है, पर हमारे कदम पीछे नहीं हट सकते, हम समस्त संसार के पालनहार (अल्लाह) के साथ हैं, हम अच्छाई के साथ हैं, हम बुराई के खिलाफ हैं, हम शैतान के खिलाफ हैं। ये कुछ तसव्वुरात हैं अगर ये आपके ज़हन में ज़िंदा हैं, तो आपकी कुर्बानी वाकई हकीकी कुर्बानी है। क्योंकि अल्लाह क़ुरआन में फरमाता है:

न उन के माँस अल्लाह को पहुँचते हैं और न उन के रक्त। किन्तु उसे तुम्हारा तक़वा (धर्मपरायणता) पहुँचता है। ★क़ुरआन (22:37)

ये आयत उन लोगों का भी जवाब है जो कहते हैं कि अल्लाह जानवर के गोश्त और खून का क्या करेगा, तो अल्लाह ने इस आयत में साफ कर दिया, कि उस तक तुम्हारा तक़वा यानि तुम्हारी स्पिरिट पहुंचती है, गोश्त और खून नहीं पहुंचता, गोश्त तो खाने की चीज़ है, और खाई और खिलाई जाती है। ये उन जहालत की रस्मों में से नहीं है, जहां जानवरों की बलि दे कर उनका मांस और रक्त मूर्तियों पर चढ़ाकर ख़ुदाओं को खुश किया जाता है, और सारा खाने लायक गोश्त बर्बाद होता है, और एक जीव बिना कुछ फायदा दिए अपनी जान से हाथ धो बैठता है, ऐसी रस्में सिर्फ खाने योग्य संसाधनों की बरबादी करती हैं।

मैं जिन तीन तरह के लोगों से मुखातिब था, उनसे मेरी बात खत्म हो गई, अब इसमें गैर मुस्लिम भाईयों की तरफ से एक आम सवाल आता है, मैं चाहता हूं कि उसे भी एड्रेस कर दूं, ताकि वो गलतफहमी भी दूर हो जाए, कुछ गैर मुस्लिम एक सवाल उठाते हैं, हालांकि उनमें से कई लोगों का मकसद सिर्फ फसाद करना होता है, लेकिन जिनको वाकई जवाब चाहिए, मैं उनके लिए जवाब दे रहा हूं:

सवाल ये उठाया जाता है कि हज़रत इब्राहिम अ० तो अपने बेटे की कुर्बानी देने गए थे, क्योंकि उनको बेटा सबसे ज़्यादा पसंद था, तो आप अपने बेटों की कुर्बानी दें, जानवरों की क्यों देते हैं, इस सवाल के जैसा एक जवाब तो ये है कि बेटे की कुर्बानी दे दें तो उस को खाया नहीं जा सकता, अल्लाह के लिए किए गए हर काम का मकसद होता है, जानवर खाए जाते हैं गरीबों को गोश्त मिलता है, और हम त्यौहार मनाते हैं, बेटे की कुर्बानी से क्या हासिल होगा? अब थोड़ा सिम्पल जवाब भी सुन लें, एक तो इब्राहिम अ० अल्लाह के नबी थे, दूसरी बात उन को ख्वाब दिखा था, कोई हुक्म नहीं हुआ था, उन्होंने उसे अल्लाह का इशारा समझा, और वो इशारा ही था, इसके ज़रिए अल्लाह को एक काम शुरू करना था। ये ध्यान रहे कि हुक्म नहीं हुआ था, क्योंकि क़ुरआन में है:

(ऐ इब्राहिम!) तुमने तो सपने को सच कर दिखाया। ★क़ुरआन (37:105)

तो एक तो वो हुक्म नहीं था, दूसरे ये कि वो नबी थे, उन्हें ईश्वर की तरफ से रोका जा सकता था, और आखिरी वक्त में रोका गया, पर हमें नहीं रोका जा सकता, क्योंकि हमारे पास ईश्वर का संदेश सीधे हमारे दिल पर नहीं आता, बल्कि क़ुरआन की शक्ल में आ गया, और वहां ईश्वर ने कह दिया कि जानवर कुर्बान करना है, तो एक तरह ईश्वर के संदेश ने ही हमें बेटों को कुर्बान करने से रोक दिया जैसे इब्राहीम अ० को रोका था। लेकिन उस पूरे सीन का मकसद ये था कि ये संदेश पहुंच जाए कि अल्लाह की राह में नेक लोगों को सब कुछ कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए, और अल्लाह की राह ही इंसानियत की राह है। तो वो नबी थे, उनके ज़रिए मानवजाति का मार्गदर्शन होता है, और हुआ भी! आखिरी वक्त में ईश्वर की तरफ से उन्हें रोक दिया गया, अब जब बेटे की कुर्बानी हुई ही नहीं, तो हम बेटे की कुर्बानी क्यों करेंगे, ये बिल्कुल बेवकूफी और केवल कटाक्ष करने वाली बात है। 

मेरे ख्याल में इतनी बात से कुर्बानी का मकसद समझ आ गया होगा, और गलतफहमियां भी दूर हो गई होंगी।

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