मुसलमानों की हालत और उसका समाधान

Akbar Ali Khan Latest Topics of Quran
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कहते हैं की इंसान अगर ठान ले तो बहुत कुछ कर सकता है और इसकी मिसाल भी हमे दुनिया में देखने को मिलती हैं की बहुत से मौको पर जब निश्चय करके आगे बड़े तो वो काम जो नामुमकिन लगते थे इंसान ने पूरे कर दिखाए लेकिन सवाल ये है की ठान लेना क्या होता है। इसका सीधा सम्बन्ध हमारी सोच से है क्युकी जब इंसान कुछ करता है तो पहले उसे करने का निश्चय वो अपने दिल या दिमाग़ में करता है और ये सोच ही है जो एक इंसान को दूसरे इंसान को अलग करती है। सोच से ही इंसान अच्छा या बुरा होता है, सफल या असफल होता है, बाप और बेटे की सोच हो या सगे भाइयो की अधिकतर उसमे फ़र्क़ होता है और इसी लिए वो अलग अलग इंसान होते हैं।  ये सोच ही थी जिसने इंसान को उन पहाड़ियों पर चढ़ा दिया जिन्हे देखकर ये सोचा भी नहीं जा सकता था। सोच ने ही सारे आविष्कार कराये आज जब हम एक देश से दूसरे देश जहाज़ों में बैठकर जाते हैं वो सोच की ही देन हैं। जब सोच की दशा सही होती है तो ज़िन्दगी के हालात बदल जाते हैं और सोचने का अंदाज़ बदलते सारी दुनिया अलग दिखने लगती है।

बेशक अल्लाह उस कौम की हालत नहीं  बदलता जब तक वो अपने अंदर को बदलें (13:11)

क़ुरान ने इंसान को ये साफ़ बता दिया की अगर तुम ज़िन्दगी के हालात बदलना चाहते हो तो फिर तुम्हे क्या करना होगा लेकिन यहाँ पर एक और बहुत ज़रूरी बात है जो क़ुरान हमे बताता है की सोच सिर्फ एक इंसान की नहीं बल्कि एक कौम की  भी होती है। हम जानते हैं की की कुछ देश वो हैं जिन्हे अपनी तरक्की, बेहतर नियम और बहुत सी अच्छाइयों के लिए जाना जाता है और कुछ देश इसके बिलकुल उलट  भी हैं ऐसा इसीलिए है की सोचने का अंदाज़ अलग है इसी तरह से किसी भी समूह के लिए ये बात ये लागू होती है चाहे वो किसी खेल की टीम हो या और कोई समूह।

मुसलामानों के हालात और उसकी वजह

आज मुसलमानो पर जो हालात हैं उन्हें हम सब जानते हैं लेकिन उन्हें सुधारने के लिए सिवाए बातो के हमारे पास कुछ नहीं है जबकि ये अल्लाह का वादा है की तुम सोच का अदाज़ जब तक नहीं बदलोगे तब तक हालात नहीं बदलेंगे। अगर हमे बड़े बदलाव चाहिये तो बदलाव करने पड़ेंगे और देखना पड़ेगा की क्या ग़लतियाँ हैं जो हम लगातार करते आ रहे हैं और कहीं ऐसा करके हम अल्लाह को नाराज़ तो नहीं कर बैठे। कुछ लोग अब भी यही समझते हैं की जो हो रहा है उसके कारण कुछ और हैं जैसे नेता और मीडिया लेकिन अल्लाह हमसे क्या कहता कुरान में हैं की अगर तुम मोमिन हो तो तुम ही ग़ालिब और वर रहोगे (3:139) और बहुत से लोग वो बी हैं जो कहते हैं की अल्लाह उन लोगो को सजा देगा हमे क्या करना है हम तो पहले से ही अल्लाह को मानते हैं और ये कहकर ज़िम्मेदारियों से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं लेकिन नजरअंदाज करने से मुसीबते तो ख़त्म नहीं होंगी बल्कि कुछ करना होगा अल्लाह ने फ़रमाया की तो फिर क्या तुम (किताबे खु़दा की) बाज़ बातों पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन्कार करते हो बस तुम में से जो लोग ऐसा करें उनकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं कि जि़न्दगी भर की रूसवाई हो और (आखि़रकार) क़यामत के दिन सख़्त अज़ाब की तरफ लौटा दिये जाए और जो कुछ तुम लोग करते हो खु़दा उससे ग़ाफि़ल नहीं है (2:85) और क़ुरान के किसी भी हिस्से पर ईमान सिर्फ वही लाएंगे जो इसे अल्लाह की किताब मानते हैं इसलिए ये भी समझ लें की परेशानियां भी अल्लाह ही की तरफ से हैं और हमारे आमालों की सजा हैं क्युकी बात सिर्फ इस दुनिया के अज़ाब की नहीं है बल्कि आख़िरत में ज़्यादा खतरनाक अज़ाब है ऐसे लोगो के लिये।

उम्मत की ज़िम्मेदारी

लेकिन इस ज़िम्मेदारी को हम बिलकुल भुला बैठे और पता नहीं की हम उम्मत का हिस्सा हैं भी  या नहीं। ये बड़ी अजीब बात हो जाती की अल्लाह ने हमे किसी घर में पैदा किया और क्युकी हम उस घर में पैदा हुए हैं इसलिए हमारे लिए जन्नत यक़ीनी है और दूसरा इंसान क्युकी दूसरे घर में पैदा हुआ तो उस पर ये ज़िम्मेदारी है की वो सच को जाने और जो उसने बचपन से सीखा उसका इंकार कर दे जबकि ज़्यादा आसान किसके लिए था अल्लाह की हिदायत को मानना ये हम सब जानते हैं। अगर ऐसा होता तो बहुत नाइंसाफी होती लेकिन इन्साफ को पसंद करता है और अल्लाह ने मुसलमान होने की ज़िम्मेदारियाँ बताई हैं और कहीं नहीं कहा की तुम्हारे ऊपर पैदाइश की बुनियाद पर जन्नत है। अब देखिए सोच इंसान को कहाँ से कहाँ ले आती है और सोच बदलने से क्या हो सकता है क्यूंकि हमने क़ुरान नहीं समझा तो कभी ये समझ ही नहीं पाए की अल्लाह ने हमसे क्या कहा था ।

सोच कैसे ज़िन्दगी को बदल सकती है

सोच हमारे ज़िन्दगी को कैसे बदलती है उसकी मिसालें हमे बहुत मिल जाएँगी जैसे की अगर कोई इंसान आपसे कुछ काम करने को कहे जिसमे मेहनत भी लगती हो तो बहुत सी बार आपको वो बुरा लग सकता है और  उस काम को आप हो सकता है दिल से नहीं करें जैसे की बहुत सी बार जॉब करते वक़्त होता है लेकिन कोई ऐसा काम जो आपके शौक का हो उसके लिए आप कितनी ही मेहनत करें जिस्म को थकान हो सकती है लेकिन दिमाग़ नहीं थकेगा ऐसे ही सोचिए की आप जिससे बहुत ज़्यादा प्यार करते हैं वो किसी मुसीबत में है तो आप अपने सारे आराम भूल कर उसके साथ लग जायेंगे और जो काम नार्मल हालात में नहीं करते वो भी करते वक़्त नहीं सोचेंगे चाहें फिर कितनी ही मेहनत लगे आप अपने सारे सुकून खाना पीना भूल जाते हैं क्युकी अब आपकी सोच बदल चुकी है इसी तरह अगर  हम अपनी सोच बदलें और समझ जाएँ की हमारे मालिक ने हमसे कुछ चाहता है और वादा किया है की  अगर तुम इस रास्ते पर चलोगे तो तुम्हारा ही फायदा है तो फिर ज़िंन्दगी का रुख बदल जायेगा सिर्फ यही नहीं की उसने हमसे कुछ चाहा है बल्कि ये की अगर हम कुछ रास्तो पर चल रहे है तो हम उसे छोड़कर उसके दुश्मन जो की शैतान है उसका साथ दे रहे हैं तो किसी भी चीज़ से बचना बहुत आसान हो जायेगा और यही तक़वा है और उसी की मोहब्बत हमें इस बात पर आमादा करेगी की हम अपनी ज़िन्दगी एक आम इंसान नहीं बल्कि एक मोमिन की तरह जियें जिससे की वो सारे वादे हम पर लागू हो सकें जो अल्लाह ने मोमिनों से किये हैं।  अल्लाह कहता है की और (वह वक़्त याद करो) जब हमने फरिश्तौं को हुक्म दिया कि आदम को सजदा करो तो इबलीस के सिवा सबने सजदा किया (ये इबलीस) जिन्नात से था तो अपने परवरदिगार के हुक्म से निकल भागा तो (लोगों) क्या मुझे छोड़कर उसको और उसकी औलाद को अपना दोस्त बनाते हो हालाँकि वह तुम्हारा (क़दीमी) दुश्मन हैं ज़ालिमों (ने ख़ुदा के बदले शैतान को अपना दोस्त बनाया ये उन) का क्या बुरा ऐवज़ है (18:50) , इससे ये बात साफ़ ज़ाहिर होती है की अगर हम अल्लाह के बताये हुए रस्ते पर नहीं चल रहे हैं तो हम शैतान की किसी तरह से मदद कर रहे हैं चाहे वो अनजाने में ही क्यों न हो और इस सोच को अपने अंदर बसा लेने से ही हम लगातार अपने मक़सद में कामयाब होते जायेंगे।

स्थायी बदलाव कैसे लाएं

एक और बहुत ज़रूरी बात ये है की हम अपने इस रवैये को बरकरार कैसे रखें क्युकी कभी कुछ सुनकर या पढ़कर हमारी ज़िन्दगी में कुछ बदलाव आते हैं लेकिन कुछ वक़्त बाद ये ठंडा हो जाता है और हम फिर वही करने लग जाते हैं इसके लिए ज़रूरी लगातार याद दिहानी अल्लाह ने क़ुरान में बहुत से टॉपिक्स को बार बार दोहराया इसी वजह से की वो चीज़ें हमारे दिल में बैठ जाएं और अल्लाह ने हमसे कहा की और याद दिहानी किए जाओ क्योंकि याद दिहानी मोमिनीन को फ़ायदा देती है (51:55), क्यूंकि चाहे कोई भी किसे भी फील्ड में कितना ही बड़ा माहिर क्यों न हो जब तक वो लगातार प्रयास नहीं करता रहेगा तब तक वो उस मकाम पे बना नहीं रह सकता जब हमारे सामने ऐसी मिसाल भरी पड़ी हैं की सोचने का अंदाज़ बदलने से हालात बदल जाते हैं और अल्लाह का वादा भी यही तो फिर हमें अभी से ऐसा कर देना है और इस दुनिया में भी मौत के बाद भी परेशानियों से बचकर अल्लाह की राजा हासिल करना है जो की असल कामयाबी है।

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