मुसलमानों की दवा

Akbar Ali Khan Duty of Muslims Latest
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एक मरीज़ को अगर सही दवा और डॉक्टर मिल जाये जो उसकी बिमारी सही होने के चान्सेस (chances) बढ़ जाते हैं लेकिन अगर बीमारी का डायग्नोसिस (diagnosis) ग़लत हो और इलाज दूसरी दिशा में चलने लगे तो बिमारी बढ़ती जाती है और मरीज़ की हालत खराब हो जाती है।  जितनी देर से इलाज किया जाये बिमारी उतनी ही गहरी होती जाती है। हमें मानना पड़ेगा की आज मुसलामानों के हालात किसी बिमारी से कम नहीं हैं और अगर इसका सही इलाज नहीं किया गया तो ये बिमारी बढ़ती जाएगी मुसलामानों के सिलसिले में परेशानी ये है कि हमें यक़ीन है कि बिमारी मरने के बाद भी चलेगी और सही नहीं हुई तो अंजाम लगातार झेलने पड़ेंगे। अफ़सोस ये है कि बड़ी तादाद मुसलमानों कि ये मानने को ही तैयार नहीं है कि कोई परेशानी है और जो मानते हैं उनमे से बहुत काम हैं जो खुद को  इसका ज़िम्मेदार मानें इसीलियें खुद का इलाज करने के बजाये ज़ोर इस बात पर होता है कि विरोधियों को पाठ पदाएँ या निचा दिखाएं जबकि इससे अपनी हालत पर न तो कोई फ़र्क़ पड़ता है न पड़ने के कोई आसार हैं। जितनी देर हम इस बात को समझने में लगाएंगे कि इस बिमारी कि जड़ हमारे अमाल हैं उतनी ही ये बढ़ेगी और अल्लाह न करे कभी ला इलाज भी हो सकती है जब पछताने के सिवा हमारे पास कुछ न हो।

इस सिलसिले में क़ुरान ने कहा है क्या तुम बाज़ बातों पर ईमान रखते हो और बाज़ से इन्कार करते हो बस तुम में से जो लोग ऐसा करें उनकी सज़ा इसके सिवा और कुछ नहीं कि जि़न्दगी भर की रूसवाई हो और (आखि़रकार) क़यामत के दिन सख़्त अज़ाब की तरफ लौटा दिये जाए और जो कुछ तुम लोग करते हो खु़दा उससे ग़ाफि़ल नहीं है (2:85) अब हम अपनी ज़िंदगियों को देखें तो पता चल जायेगा कि हम में लगभग सब इस कानून कि चपेट में आतें हैं क्यूंकि हम अव्वल तो जानते ही नहीं कि क़ुरान हम से क्या  कहता है और दूसरे कुछ सुनी सुनाई बातों को मान भी लें तो जब हमें कोई ज़ाति घाटा या अपनी ख्वाहिशो का खून होता हुआ दिखता है तो बड़े आराम से हम उन हुक्मो को अपनी ज़िन्दिगियों में लागू नहीं करते।

सही दिशा में इलाज

बहुत से लोग हैं जो बड़ी गंभीरता से मुसलामानों में सुधार के लिए काम कर रहे हैं अपने पैसा समय सब लगा रहे हैं लेकिन उसका वक़्ती फायदा तो चाहें कुछ हो जाये परमानेंट (permanent) नहीं हो रहा है जानते हैं इसकी वजह सिर्फ ये है कि वो क़ुरान से हल नहीं ले रहे हैं।  हमें ये ही साफ़ नहीं है कि जब हम कहते हैं कि हम एक उम्मत हैं तो उसका क्या मतलब है।  क़ुरान ने कहा तुम उम्मते ख़ैर हो जो कि इंसानों के लियें निकाले गए हो तुम उन्हें मारूफ का अमर देते हो और बुरे कामों से रोकते हो और ख़ुदा पर ईमान रखते हो (3:110) लेकिन कितने हैं हम में से जो इस मक़सद के तहत उम्मत का हिस्सा खुद को मानते हैं अगर नहीं तो या तो हमारा ये मानना है कि हम इस उम्मत में नहीं हैं या फिर ये कि हम क़ुरान कि इस आयात को नहीं मानेंगे इसके अलावा कोई मतलब निकलना मुश्किल है। अगर इलाज उस तरीक़े से नहीं करेंगे जो अल्लाह ने बताया है तो न तो इलाज हो पायेगा न ही ज़्यादा फायदे मिल पाएंगे।  हम में किसी को ये मानने में परहेज़ नहीं होना चाहिए कि असल में इलाज सिर्फ अल्लाह दे सकते हैं। हम में से ज़्यादातर को ये समझा दिया गया है कि मुसलमान घर में पैदा हो गए तो कामयाबी पक्की हो गयी और कहीं अगर उसके ऊपर 5 वक़्त कि नमाज़ और रोज़े और कुछ अरकान कर लिए तो अब तो जन्नत में जाने से कोई रोक ही नहीं सकता जबकि अल्लाह ने कहा ईमान वालों तुम सबके सब एक बार इस्लाम में (पूरी तरह) दाखि़ल हो जाओ और शैतान के क़दम ब क़दम न चलो वह तुम्हारा यक़ीनी ज़ाहिर ब ज़ाहिर दुश्मन है (2:208) और हमने ऊपर आयात में पड़ा कि आधा अधूरा इस्लाम ज़िन्दगी में उतरने से क्या होता है। इसलियें ज़रूरी है कि हम खुद भी इस पर पूरी तरह से अमल करें और दुसरो को भी इसकी याद दिहानी कराएं क्युकी क़ुरान ने कहा  और याद दिहानी किए जाओ क्योंकि याद दिहानी मोमिनों को फ़ायदा देती है (51:55)। वरना ये बात भी समझ लें कि मुसलमान और मुनाफ़िक़ में सामने से कोई फ़र्क़ नहीं होता दोनों का दावा एक जैसा ही होता फ़र्क़ सिर्फ ये है कि मोमिन सिर्फ दावा नहीं करता बल्कि उसके अमाल भी उसके दावे को साबित करते हैं मुनाफ़िक़ के अमाल खोकले होते हैं और वो सिर्फ बातें करता है।

मक़सद की एहमियत

जब तक मक़सद साफ़ नहीं है तब तक कोई काम करना या ना करना बहुत फ़र्क़ नहीं डालता इसीलियें इस उम्मत का जो मक़सद है उस पर ईमान लाना ज़रूरी है वरन बेमक़सद किये गए काम कुछ सिर्फ टेम्पररी (temporary) हल दे पाएंगे। हमारी ज़िन्दगी का मक़सद है अल्लाह कि रज़ा को पा लेना और वो अमाल कि बुनियाद पर होगा अल्लाह ने अपने रसूल (स े)  को सारे जहाँ के लिए रेहमत बनाकर भेजा और उनके उम्मती होने के नाते हमारा मक़सद है इस रेहमत को सारे जहाँ में फैलाना ना कि उनसे लड़ना या उन्हें नीचे दिखाना। आज से ही ये ठान लें कि हम सारी इंसानियत के फायदे के लिये जुट जायेंगे और वो पैग़ाम सारी दुनिया तक पहुचायेंगे जिससे इस दुनिया के लोग खुशहाल हो जाएं।  मुसलमान पता नहीं कब से खुद को एक कम्युनिटी समझने लगा जबकि सच्चाई तो ये है कि ये एक उम्मत है और इस उम्मत के असली मेंबर्स वो हैं जो इसका मक़सद पूरा कर रहे हैं। और फिर उन्ही के लिये सारी खुशखबरियां भी हैं क़ुरान ने जब मुनाफ़िक़ों कि तरफ इशारा किया तो जो बातें कहीं उनका सारांश है कि ये लोग कहतें तो हैं कि हम ईमान वाले हैं लेकिन जब इनसे कहा जाता है कि अमल से साबित करो तो पीछे हट जातें हैं और ये झूठे हैं लेकिन इन्हे इसका शऊर भी नहीं है मतलब इनमे से बहुत से ऐसे भी हैं जो खुद को सच में ईमान वाला समझते हैं लेकिन हैं मुनाफ़िक़ और हम जानते कैसे हज़रत उमर बार बार यही सोचते और पूछते रहते थे कि कहीं में मुनाफ़िक़ तो नहीं ये वो थे जिन्हें जन्नत कि बिशारत दुनिया में ही कर दी गयी इसके उलट आज बहुत से लोग दावा करते हैं कि हम तो अल्लाह के क़रीबी हैं और जन्नत तो हमारे ऊपर लाज़िम है जानते हैं क़ुरान ने जब बानी इस्राइल का ज़िक्र किया तो उनकी एक सिफ़त बताई और रसूल अल्लाह (सO) कि एक मशहूर हदीस के मुताबिक़ जिस राह पर बानी इस्राइल चले बहुत से मुसलमान भी उसी तरह का रास्ता अपनाएंगे। क़ुरान ने कहा और कहते हैं कि गिनती के चन्द दिनों के सिवा हमें आग छुएगी भी तो नहीं इन लोगों से कहो कि क्या तुमने खु़दा से कोई इक़रार ले लिया है कि फिर वह किसी तरह अपने इक़रार के खि़लाफ़ हरगिज़ न करेगा या बे समझे बूझे खु़दा पर बोहतान जोड़ते हो (2:80), आज आपको मुसलामानों कि अक्सरियत ऐसे दावे करते हुए दिख जाएगी। हमें सारी इंसानियत के लिये निकला गया था न कि सिर्फ उन लोगो के लिये जो खुद को मुसलमान कहते हैं और देखिए कुछ क़ौमें जो पूरी इंसानियत कि मददगार हैं उनकी इज़्ज़त क्या है। इसलियें ये समझ लीजिये कि जो इलाज अल्लाह ने बताया है उसको अगर छोड़ देंगे तो फिर कुछ भी करते रहें कोई फायदा नहीं होना वाला।

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