Mob Lynching

Mob Lynching रोकने का एक लोता रास्ता!

Islam is Peace
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हिंदुस्तान – एक ऐसा देश है जो अनेकता में एकता के दर्शन में विश्वास रखता है। Mob Lynching: लेकिन कुछ सालों में देखा गया है कि एक भीड़ इकट्ठा होती है और किसी की जान ले लेती है। क्या मुसलमानों ने कभी यह सोचा है कि ऐसा क्यों हो रहा? दिन प्रति दिन उनके खिलाफ नफरत क्यों बढ़ती जा रही है? जो अपने आप को ईश्वर भक्त (अल्लाह का बन्दा) कहते हैं और जिनका रक्षक अल्लाह है, उस क़ौम को क्यों आज अल्लाह ने लोगो के हवाले कर दिया है? क्या हमने इन प्रशनों का उत्तर कभी अल्लाह की किताब से जानने की कोशिश की? हमारा दावा तो यह है कि अल्लाह की किताब यानि क़ुरआन में हर समस्या का हल है। तो आख़िर क्यों हम mob lynching का कारण और हल क़ुरआन से पता नहीं करते?  यह हिंसा (Mob Lynching) जो मुसलमानों के खिलाफ हो रही है कही उसका कारण हम खुद तो नहीं? क्यूंकि क़ुरआन कहता है:

जो मुसीबतें तुम्हे पहुँची वह तो तुम्हारे अपने हाथों की कमाई से पहुँची और बहुत कुछ तो वह माफ़ कर देता है। (42:30)

क़ुरआन की माने तो ये सज़ा (Mob Lynching) हमें अपने अमल और फैसलों की वजह से मिल रही है। क्या उम्मत आज अपने स्तर से गिर चुकी है? यानि मुस्लिम उम्मत अपने मूल उद्देश्य को भूल चुकी है। उम्मत के स्तर पर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी न करने की वजह से हम अज़ाब (Mob Lynching) का शिकार हो चुके हैं। और यह अज़ाब दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा। उम्मत का असल उद्देश्य यह है कि, इस उम्मत को इंसानों की भलाई के काम करने हैं और जो इंसानों के लिए बुरा है उससे उन्हें रोखना है।

तुम एक उत्तम उम्मत हो, जो लोगों के समक्ष लाई गई है। तुम नेकी का हुक्म देते हो और बुराई से रोकते हो और अल्लाह पर ईमान रखते हो। (3:110)

यह सवाल आप अपने आप से पूछिए क्या उम्मत आज अपने उद्देश्य को पूरा कर रही है? जब उम्मत का उद्देश्य ही छोड़ दिया तो अल्लाह की ओर से यह सज़ा और अज़ाब हमारे लिए क्यों न हो? क़ुरआन की माने तो इस उम्मत को इंसानों के लिए लाया गया था ताकि हम लोगो के लिए अच्छी चीज़ों की प्राप्ति और उन्हें हानि पहुंचाने वाली चीज़ को उनसे दूर करने की कोशिश करें। जब हम उम्मत का उद्देश्य भूल कर उम्मत ही न रहे हों तो लोगो की नफ़रतें हमारे प्रति क्यों न हों?

कहो, “वह इसकी  सामर्थ्य रखता है कि तुमपर तुम्हारे ऊपर से या तुम्हारे पैरों के नीचे से अज़ाब भेज दे या तुम्हे टोलियों में बाँटकर परस्पर भिड़ा दे और एक को दूसरे की लड़ाई का मज़ा चाखाए।” (6:65)

क़ुरआन की इस आयत से बात साफ़ हो जाती है कि अल्लाह किस तरह से अज़ाब भेजता है। चाहे अज़ाब टोलियों में बटकर हो जैसे कि शिया-सुन्नी जंग। और चाहे अल्लाह तुम्हारे ऊपर किसी को मुसल्लत कर दे। वह चाहे तो अफ़ग़ानिस्तान और इराक में ईसाईयों को तुम्हारे ऊपर मुसल्लत कर दे। वह चाहे तो म्यंमार और श्रीलंका में बौद्धों के हाथों तुम्हे अज़ाब दिलाए। वह चाहे तो हिंदुस्तान में तुम्हे हिन्दुओं के हवाले कर दे। इस बात में कोई शक नहीं कि मुसलमानों ने उम्मत के स्तर पर अपनी ज़िम्मेदारी पूरी नहीं की जिसकी वजह से वह आज अज़ाब में गिरफ्तार । क्या अब यह अज़ाब यूँही चलता रहेगा या इस अज़ाब को ख़त्म भी किया जा सकता है? अल्लाह की किताब ने इस बात का भी जवाब दिया:

अगर अल्लाह लोगों को उनके अत्याचार पकड़ने ही लग जाता तो धरती पर किसी जीवधारी को न छोड़ता, किन्तु वह उन्हें एक निश्चित समय तक टाले जाता है। फिर जब उनका नियत समय आ जाता है तो वे न तो एक घड़ी पीछे हट सकते है और न आगे बढ़ सकते है। (16:61)

कोई शक नहीं उम्मत पर अज़ाब चल रहा है। लेकिन अब भी मुसलमानों के पास मुहलत है की वह अपने उम्मत होने का उद्देश्य जल्द से जल्द समझें कहीं ऐसा न हो बहुत देर हो जाए और अल्लाह का अज़ाब मुसलमानों पर अटल हो जाए। क्यूंकि जब अज़ाब शुरू हो जाता है या उसके आसार नज़र आने लगते हैँ तो कुछ वक़्त तक की मुहलत अल्लाह की तरफ से दी जाती है, लेकिन एक बार वो मुहलत ख़त्म उसके बाद नहीं सुनी जाती। क़ुरआन बहुत स्पष्ट शब्दों में कहता है कि जब अल्लाह का अज़ाब आता है तो सिर्फ ज़ालिम ही हलाक़ होते हैं।

कहो, “क्या तुमने यह भी सोचा कि यदि तुमपर अल्लाह का अज़ाब अचानक या ज़ाहिर आजाए तो ज़ालिमों के सिवा और कौन हलाक़ होगा?” (6:47)

…और हम बस्तियों को हलाक़ नहीं किया करते मगर उस हालत में कह वहाँ के लोग ज़ालिम हों। (28:59)

यहाँ एक बड़ा सवाल उठता है की ज़ालिम कौन? अल्लाह के कलाम की माने तो अल्लाह के अज़ाब में सिर्फ ज़ालिम ही गिरफ्तार होते हैं। तो फिर हिंदुस्तान में मुसलमानों का ऐसा हाल क्यों हो रहा है? क्या हमने कभी यह सोचा की अल्लाह की सूची में मुस्लमान तो ज़ालिम नहीं? ज़ुल्म सिर्फ किसी को सताना या मरना नहीं होता। ज़ुल्म का अर्थ होता किसी को उसके स्थान से हटा देना। क़ुरआन ने शिर्क को भी ज़ुल्म कहा।

…निश्चय ही शिर्क (बहुदेववाद) बहुत बड़ा ज़ुल्म है।” (31:13)

मुसलमान अपनी जगह से हटे तो अल्लाह की सूचि में ज़ालिम हो गए। लेकिन उन लोगो का क्या जो मुसलमानों को मार और सता रहे हैं, क्या वह ज़ालिम नहीं? तो अल्लाह का अज़ाब उनपर क्यों नहीं आता? क्या अल्लाह की सूचि में वह ज़ालिम हैं या कुछ और? क़ुरआन उन्हें ज़ालिम नहीं बल्कि ग़ाफ़िल कहता है।

यह जान लो की तुम्हारा रब ज़ुल्म करके बस्तियों को हलाक़ करने वाला न था, जबकि उनके निवासी ग़ाफ़िल रहे हो। (6:131)

इस अज़ाब से बहार निकलने के लिए यह ज़रूरी है उम्मत-ए-मुस्लिमः अपनी उम्मत होने की ज़िम्मेदारी समझे और हुज्जत पूरी करदें यानि दलीलों के साथ दीन पंहुचा दे। जिस दिन मुस्लमान अपनी ज़िम्मेदारी पूरी करेंगे उस दिन या तो वह ईमान लायेगें या अल्लाह की सूचि में ज़ालिम क़रार होंगे। अगर ऐसा नहीं करेंगे तो मुसलमानों पर अज़ाब जारी रहेगा।

बचो उस फ़ितने से जो अपनी लपेट में विशेष रूप से केवल ज़ालिमों को ही नहीं लेगा… (8:25)

क़ुरआन ने एक और उसूल हमे दिया, अल्लाह के अज़ाब से सिर्फ इस्लाह करने वाले ही बचाए जाते हैं।

तुम्हारा रब तो ऐसा नहीं है कि बस्तियों को ज़बरदस्ती हलाक़ कर दे, जबकि वहाँ के निवासी बनाओ और सुधार में लगे हों  (11:117)

जब तक किसी बस्ती में इस्लाह करने वाले हों, तब तक उस बस्ती पर अल्लाह का अज़ाब नहीं आता। एक और उसूल क़ुरआन ने अज़ाब के बारे में बयान किया

…और हम लोगों को अज़ाब नहीं देते जब तक कोई पैग़म्बर न भेज दें। (17:15)

जब तक अल्लाह का पैग़ाम उसके बन्दों तक न पहुँच जाए जब तक लोगों पर अज़ाब नहीं आता। क्या हम ने अल्लाह का पैग़ाम अल्लाह के बन्दों तक पहुँचा दिया? अगर हमने दीन को लोगो तक नहीं पहुंचाया तो ज़ालिम कौन? और अल्लाह का अज़ाब किस पर आएगा?

जो लोग कार-ए-रिसालत अंजाम देंगे सिर्फ उन्ही लोगों को अज़ाब से बचाया जायेगा।

फैसला आपका, अज़ाब में रहना चाहते हैं, या अज़ाब से बाहर निकलना चाहते हैं?


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