लॉकडाउन का सकारात्मक (Positive) इस्तेमाल कैसे करें।

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ये लेख़ मेरे एक प्रिय मित्र को समर्पित

आज पूरी दुनिया एक बहुत बड़ी परेशानी में घिरी हुई है और उससे निपटने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगाई हुई है। लेकिन अगर इंसान अपनी बुद्धि और विवेक से सोचे तो यह मुद्दा सिर्फ कोरोनावायरस से निपटने का नहीं बल्कि उससे अधिक गहरा है। सच ये है, किसी भी परिस्थिति में सफलता के लिए एक सूत्र है:

हमें उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो हम नियंत्रित (कण्ट्रोल) कर सकते हैं, बजाय इसके कि हम क्या नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, हमें अपनी चिंताओं की लंबी सूची को केवल एक चिंता तक सीमित करना चाहिए।

हमारी रोज़मर्रा की ज़िन्दगी अलग-अलग परेशानियों से भरी हुई है। और यह नए संकट नई चिंताओं और नए भय लाता है। इसके नतीजे में हमारे दिल थक गए और अभिभूत (Overwhelmed) हो गए। ऐसा इसलिए है – हमारा दिल केवल एक परम सत्य (eternal truth) के लिए बनाया गया है और वह परम सत्य अपने ईश्वर को पहचान लेना (मारिफ़त-ए-ख़ुदा)। या आसान भाषा में कहूं तो हमारे बनाने वाले का क्या मक़सद है, उस मक़सद को प्राप्त करने की चिंता में लग जाना। जब इंसान इस चिंता में लग जाता है जब उसे किसी बात की चिंता नहीं रहती। और इंसान अपने मालिक के बनाये हुए क़ानून के मुताबिक़ अच्छे और बुरे में फ़र्क़ करते हुए उस मक़सद को हासिल करने में लग जाता है।

आज हम सभी ने अपने जीवन पर विराम (Pause) का बटन दबा दिया है। हम काम पर नहीं जा रहे हैं, हम स्कूल नहीं जा रहे हैं, हम बाहर खाने या ख़रीदारी करने या कॉफी या रात के खाने के लिए दोस्तों से मिलने नहीं जा रहे हैं। हम सफ़र नहीं कर रहे हैं , ना ही समूह (जमात) में प्रार्थना कर रहे हैं। कोई भी बार या कैसिनो या क्लब में नहीं जा रहा है।

लोग चर्चा कर रहे हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है? क्या यह एक सज़ा है? क्या यह एक परीक्षा है? क्या कोई छिपी हुई बरकत (blessing) है? क्या इसमें कोई साजिश हो सकती है? वही कुछ लोग हर ख़बर, आँकड़े  (statistic), समाचार कहानी या शीर्षक पर पूरी नज़र रखे हुए हैं।

जबकि विचार इसपर होना चाहिए कि, क्या मैं ईश्वर से प्रेम करता हूँ? क्या मैं ईश्वर की बनायीं हुई सृष्टि(तख़लीक़) से प्रेम करता हूँ? क्या कभी सोचा इन बातों का वाक्य का अर्थ क्या है? इस वक़्त इसका मतलब है इस सृष्टि के मालिक की पलटना। इसका मतलब है ईश्वर की याद को अपने हृदय में ज़िंदा करना। इसका अर्थ है ईश्वर की निशानियों और नियमों को समझना और समझकर ईश्वर का बन्दा (भक्त) बन जाना।

इसका अर्थ है अपने दिल और अपने कार्यों को सुधारना। इसका मतलब इस बात की चिंता करना है कि क्या मैंने अल्लाह और बन्दों (और उसकी सारी सृष्टि) के अधिकारों को पूरा किया है। क्या मैं सामाजिक गड़बड़ी से दूसरों की रक्षा कर रहा हूं? क्या मैंने अपने वातावरण अधिकारों को पूरा किया है? क्या मैंने अपने माता-पिता, अपने पति या पत्नी, अपने बच्चों, अपने पड़ोसियों के साथ सही किया है? क्या मैंने अपने आसपास के लोगों के अधिकारों को पूरा किया है?

हम में से हर एक, एक दिन मर जाएगा। और हम में से हर एक हमारे निर्माता (बनाने वाले ईश्वर) के सामने अपने कर्मों (अमालों) को लेकर उपस्थित (मौजूद) होगा। यह कब की बात नहीं है। यह कैसे के बारे में है। मेरा दिल किस अवस्था में होगा? मेरे कार्य किस अवस्था में हैं? तो आइए हम बहस और खबरों के जुनून को एक तरफ़ रख दें, और उस पर ध्यान केंद्रित करें जो हम नियंत्रित कर सकते हैं। और उनपर भी जो ज़रूरी हैं।

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