क्या पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ इस्लाम के संस्थापक थे?

Latest Prophet as Mercy Shuja Khan
Share this post
  • 151
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    151
    Shares

आज लोग ये समझते हैं कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने इस्लाम की शुरुआत की। चाहे सोशल मीडिया हो या कोई और माध्यम लोग ये सवाल अक्सर पूछते हुए नज़र आते हैं। और जो ये सवाल नहीं करते वह भी यही मानते हैं कि इस्लाम 1400 साल पुराना धर्म है। इस बात में कितनी हक़ीक़त और कितनी कल्पना है, इस बात पर तो आगे ज़रूरो चर्चा की जाएगी। परन्तु, उस से पहले आपसे मेरा कुछ प्रश्न हैं – अगर 1400 साल पहले पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने किसी नए धर्म की स्थापना की तो उससे पहले के लोगो को कामयाबी किस मार्ग पर चल कर मिलेगी? क्या ईश्वर समय-समय पर अपना धर्म बदल देता है? क्या हर काल, समुदाय अथवा देश के लिए ईश्वर ने अलग-अलग धर्मों की स्थापना की? सोचने वाली बात है कि जब ईश्वर एक है तो उसके धर्म अनेक कैसे हो सकते हैं?

आप किसी मुस्लमान से एक प्रश्न कीजिये, वह ये की दुनिया के सबसे पहले इंसान और पैग़म्बर कौन थे? हर मुस्लमान आपको बिना देरी किये एक ही उत्तर देगा। वह कहेगा कि दुनिया के सबसे पहले इंसान और पैग़म्बर हज़रत आदम थे। आप उस से अगला सवाल कीजिये, वह ये की हज़रत आदम किस धर्म को माने वाले थे? बिना विलम्भ किये आपको उत्तर मिलेगा कि हज़रत आदम का धर्म इस्लाम था।

आईये अब आपको आगे ले चलता हूँ, एक और प्रश्न कीजिये कि इस्लाम के आख़िरी पैग़म्बर कौन थे? आपको इसका उत्तर मिलेगा कि हज़रत मुहम्मद ﷺ।

अब एक प्रश्न आप अपने आपसे कीजिये – जब इस्लाम के पहले पैग़म्बर हज़रत आदम और आख़िरी हज़रत मुहम्मद ﷺ हुए तो इस्लाम की स्थापन 1400 साल पहले कैसे हो सकती है? आईये अब आपको क़ुरआन की तरफ़ ले चलता हूँ:

उसने तुम्हारे लिए वही धर्म निर्धारित किया जिसकी ताकीद उसने नूह को की थी।” और वह (जीवन्त आदेश) जिसकी प्रकाशना

हमने तुम्हारी ओर की है और वह जिसकी ताकीद हमने इबराहीम और मूसा और ईसा को की थी यह है कि “धर्म को क़ायम करो और उसके विषय में अलग-अलग न हो जाओ… (42:13)

क़ुरआन की इस आयत से हमें साफ़ पता चलता है कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ को वही एक धर्म दिया जो उनसे पहले पैग़म्बरों को दिया गया था। इस से दो बातें साफ़ ज़ाहिर होती हैं, पहली ये कि धर्म ईश्वर का दिया हुआ है न की मनुष्य का बनाया हुआ। दूसरा ये कि धर्म हमेशा से एक ही चला आरहा है।

साथ ही अगर इस विषय में क़ुरआन का अध्यन करें तो हमें पता चलता है कि क़ुरआन हमें पिछले पैग़म्बरों में और साथ ही उनको

जो ईश्वाणी (वही) दी गयी उसमें भी आस्था रखने का हुक्म देता है। क़ुरआन की इस आयत को देखिये:

(ऐ रसूल उन लोगों से) कह दो कि हम तो ख़ुदा पर ईमान लाए और जो किताब हम पर नाज़िल हुई और जो (सहीफ़े) इबराहीम और इस्माईल और इसहाक़ और याकूब और औलादे याकूब पर नाज़िल हुये और मूसा और ईसा और दूसरे पैग़म्बरों को जो (जो किताब) उनके परवरदिगार की तरफ़ से इनायत हुई (सब पर ईमान लाए) हम तो उनमें से किसी एक में भी फ़र्क़ नहीं करते… (3:84)

आपने देखा कैसा क़ुरआन पहले पैग़म्बरों और पिछली किताबों पर आस्था रखने की बात करता है। अगर पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने किसी नए धर्म की स्थापना की होती तो पिछले पर आस्था रखने का सवाल ही नहीं उठता? बात बहुत साफ़ है कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने ईश्वर की ओर से जो धर्म आया, उन्होंने लोगो को न केवल उसका सही स्वरुप बताया बल्कि स्वय भी उस मार्ग पर चल कर दिखाया।

ईश्वर ने समय-समय पर मानवता की ओर अपने पैग़म्बर भेजे ताकि वह मानवता को ईश्वर की इच्छा यानि धर्म पंहुचा दें। और

धर्म या पैग़ाम भी क़ौम की भाषा में ही पहुंचाया गया ताकि उनकी समझ में भी आये। क़ुरआन कहता है कि – हमने जो रसूल भी भेजा, उसकी अपनी क़ौम की भाषा के साथ ही भेजा, ताकि वह उनके लिए अच्छी तरह खोलकर बयान कर दे… (14:4)

इस आयत को देखने के बाद ये बात और स्पष्ट हो जाती है कि समय-समय पर ईश्दूत आते रहे और अपनी क़ौम को वही एक ईश्वर

का सन्देश पहुंचते रहे। ईश्वर ने एक माता और एक पिता से मानवता की शुरुआत की फिर लोग समय के साथ आपस में बटते रहे और ईश्वर के धर्म को छोड़कर अपने मत और दर्शन बना लिए। पुनः दुर्भाग्य ये हुआ कि लोगो ने अपने बनाये हुए मत और दर्शन को धर्म का नाम देना शुरू किया जिसकी वजह मानव ईश्वरीय धर्म से दूर होता चला गया। यही कारण है मानव मत और दर्शन के नाम पर लड़ता रहा और इन मतों और दर्शनों के आपसी विरोधाभास को वह धर्म का नाम देता रहा। लड़ाई भाषा के आधार पर भी हुई। पानी, जल, water तो सब की  समझ में आता है लेकिन ईश्वर, God, अल्लाह से लोग समझते हैं ये अलग-अलग ख़ुदा के नाम हैं। आधार ईश्वाणी (ख़ुदा की ओर से धार्मिक पुस्तकें) और आपसी समानताएँ हो तो आपसी टकराओ और मदभेदों को दूर करने के साथ सही इश्वरिये धर्म पर भी वापस आया जा सकता है।

वो एक धर्म जिसको समय और काल के हिसाब से मानव जाती को समय-समय पर दिया गया, उसी धर्म को मुकम्मल और महफूज़ आख़िर पैग़म्बर के माध्यम से कर दिया गया। क़ुरआन ने इसको बताया:

…आज मैंने तुम्हारे धर्म को पूर्ण कर दिया और तुम पर अपनी नेमत पूरी कर दी और मैंने तुम्हारे धर्म के रूप में इस्लाम को पसन्द किया… (5:3)

जो ग़ैर मुस्लिम भाई आर्टिकल को पढ़ रहे हैं वह इस्लाम शब्द से परेशान न हो। इस्लाम का वास्तिविक अर्थ है शांति। जैसा मैंने ऊपर कहा कि लड़ाई भाषाओं के आधार पर है, आप यहाँ इस्लाम को ईश्वरीय धर्म समझिए, वह धर्म जो शाश्वत है जो सदैव चला आरहा है।

इस विषय पर मैं क़ुरआन से बहुत सारे सबूत और पेश कर सकता हूँ परन्तु बात लम्बी हो जाएगी। क़ुरआन की एक और आयत आपके सामने पेश करता हूँ और फिर अपनी बात हो विराम देता हूँ।

मुहम्मद तुम्हारे पुरुषों में से किसी के बाप नहीं है, बल्कि वे अल्लाह के रसूल और नबियों के समापक है। अल्लाह को हर चीज़ का पूरा ज्ञान है (33:40)

क़ुरआन की इस आयत से हमें पता चलता हैं पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ आख़िरी ईश्दूत हैं जिनपर रिसालत (Prophethood) आकर पूरी हो गई। इस आयत से ये बात भी स्पष्ट है कि पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ इस्लाम के पहले नहीं बल्कि आख़िर पैग़म्बर हैं। जो आख़िरी है वह संस्थापक नहीं होता। धर्म ईश्वर की ओर से एक ही है, जो समय-समय पर ईश्दूतों के मध्यान से मानवता को पहुंचाया गया ।

Facebook Comments

Share this post
  • 151
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    151
    Shares

1 thought on “क्या पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ इस्लाम के संस्थापक थे?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *