क्या मुसलमान भी मुनाफिक़ हो सकता है?

Duty of Muslims Latest Muhammad Amir Ansari
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क्या मुसलमान भी मुनाफिक़ हो सकता है? मैं जानता हूं बहुत से लोग टाइटल देखने के बाद सोच रहे होंगे, कि इसमें क्या नई बात है, मुनाफिक़ तो होते ही मुसलमानों में से हैं, जो मुसलमानों के बीच दिखावे के मुसलमान बन कर रहते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर वो इस्लाम के मुखालिफ होते हैं! हां बिल्कुल, आपने सही सोचा; मुनाफिक़ आम तौर पर यही होते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि खुद को एक सच्चा पक्का मुसलमान समझने वाला शख्स भी मुनाफिक़ हो सकता है! अब ये बात शायद आपको थोड़ी अजीब लगी होगी, और लगनी भी चाहिए, क्योंकि मुनाफ़िक़ों के हवाले से मुसलमानों की आम सोच यही है कि मुनाफिक़ तो वही होता है जो इस्लाम का लबादा ओढ़ कर इस्लाम के खिलाफ काम करता है, पर हकीकत कुछ और है, हम कह सकते हैं कि ये भी मुनाफिक़ होते हैं, लेकिन सिर्फ ये ही नहीं होते, कुछ और भी होते हैं। ये मैं नहीं कह रहा खुद नबी ﷺ के अक़वाल और सहाबा की ज़िंदगी इस बात की गवाह है कि हम ने मुनाफिक़ के मसले को पूरी तरह से समझा ही नहीं है, या फिर हम जान बूझ कर उसको इग्नोर करते हैं। अपनी बात की वज़ाहत मैं कम अल्फ़ाज़ में ही नबी ﷺ की कुछ हदीसों से करूंगा, ताकि कोई शक ओ शुबह की गुंजाइश न बचे, और मसला बिल्कुल वाज़ह जाए। अब कुछ हदीसें देखें:

आप ﷺ ने फरमाया: मुनाफिक़ की अलामतें तीन हैं, जब बात करे झूठ बोले, जब वादा करे तो उसके खिलाफ करे, और जब उसको अमीन बनाया जाए तो खियानत करे! सही बुखारी (33) सही मुस्लिम (211, 212)

इसको और ज़्यादा तफसील से एक और अलामत के साथ इस हदीस में बताया गया: रसूल अल्लाह ﷺ ने फरमाया: चार आदतें जिस किसी में हों, तो वो ख़ालिस (पक्का) मुनाफिक़ है, और जिस किसी में इन चारों में से एक आदत हो, तो वो भी निफाक़ ही है, जब तक उसे छोड़ ना दे, (वो ये हैं:) जब इसे अमीन बनाया जाए तो खियानत करे, और बात करते वक़्त झूठ बोले, और जब अहद करे तो उसे पूरा ना करे, और जब लड़े तो गालियों पर उतर आए। सही बुखारी (34)

यहां एक बात अर्ज़ कर दूं, कि अरबी के स्कॉलर शेख नोमान अली खान से मैंने एक बार इस हदीस के बारे में सुना था, कि आम तौर पर इसका तर्जुमा गालियां कर दिया जाता है, जबकि वहां जो अरेबिक लफ्ज़ है उसका मतलब होता है कंट्रोल खो देना, यानी गुस्से में जो अपना आपा खो दे। लेकिन दोनों में जो भी हो, हमारे लिए फ़िक्र करने का मकाम है। जिसके अंदर ये आदतें हैं उसको ख़ालिस मुनाफिक़ होने का फतवा खुद नबी ﷺ ने दिया है, और जिसमें एक हो तो वो भी निफाक़ है, जब तक कि वो उसे छोड़ ना दे, अल्लाह हमारी हिफाज़त फरमाए।

अब वो जो मैंने ऊपर पहली हदीस के सही मुस्लिम के रेफरेंस दिए हैं, 211 और 212! ठीक उससे अगली 213 नंबर हदीस में, उसकी और सख्त तफसील बयान हुई है, ज़रा गौर से देखें:

याहया बिन मुहम्मद बिन क़ैस अबु ज़ुक़ीर ने कहा: मैंने अला बिन अब्दुर्रहमान को इसी सनद के साथ हदीस बयान करते हुए सुना, उन्होंने कहा: मुनाफिक़ की अलामतें तीन हैं, चाहे वो रोज़ा रखे, नमाज़ पढ़े, और अपने आप को मुसलमान समझे। ★सही मुस्लिम (213)

ये हदीस अंदर तक हिला देती है, इसके अल्फ़ाज़ बहुत सख्त हैं, हमें बहुत ज़्यादा अलर्ट रहने की ज़रूरत है, ये आज के मुस्लिमों के आम मामलात हैं, और ऐसा लगता है कि इस हदीस में रोज़ा रखने, नमाज़ पढ़ने और अपने ज़हन में खुद को मुसलमान समझने वालों को सख्त धमकी दी गई है, कि देखो ये आदतें मत इख्तेयार कर लेना।

तो दोस्तों ये इतना हल्का मसला नहीं है, हम इसमें आसानी से गिरफ्तार हो सकते हैं, आपको क्या लगता है, जब हज़रत उमर र० चुपचाप राज़दार ए रसूल हज़रत हुज़ैफा र० के पास जा कर पूछ रहे थे कि मुनाफ़िक़ों

की लिस्ट में मेरा नाम तो नहीं है, तो क्या उनके ज़हन में ये था कि मैं अंदर अंदर इस्लाम का मुखालिफ हूं, माज़अल्लाह, बिल्कुल नहीं! वो तो इस्लाम के लीडर थे, आराम से बैठते कि मुनाफिक़ तो बस वो होते हैं जो इस्लाम का लबादा ओढ़ कर अंदर अंदर इस्लाम के खिलाफ रहते हैं, लेकिन नहीं! वो मुनाफिक़ की वो हकीकत जानते थे, जो अफसोस आज आम मुसलमान नहीं जानते, और इसका खौफ होना अपने आप में मज़बूत ईमान की निशानी है।

आज भी इसको पढ़ने के बाद अगर आपके दिल में इसका खौफ और फ़िक्र पैदा होती है, तो ये आपके ईमान की निशानी है, डरने की ज़रूरत उन लोगों को है जो बड़े आराम से खुद को ईमान वाला समझे बैठे हैं, और इन बुराइयों से दो चार होने के बाद भी कभी इस पर मलाल नहीं होता, उन्हें आज ही सच्ची तौबा कर के अपने रब की तरफ पलटने की ज़रूरत है।

लेकिन ये याद रखें कि मैंने उसूली बात करी है, ताकि हम अपनी और दूसरों की इसलाह करें, हमें किसी और का ज़ाहिर पर फैसला नहीं करना है, फैसला करना अल्लाह का काम है, हम अपने अंदर झांकें कि कहीं हम इन उसूलों की जद में तो नहीं आ रहे, और दूसरे लोगों की भी इसलाह करें, किसी के ज़ाहिर को देख कर उसके ऊपर मुनाफिक़त के फतवे लगाने शुरू ना कर दें!

अल्लाह से दुआ है कि अल्लाह हमें इन आदतों से बाज़ रहने की तौफीक अता फरमाए, अफसोस! ये बुराइयां आज मुस्लिमों की आम ज़िन्दगी का हिस्सा बन चुकी हैं, अल्लाह हमारी हिफाज़त फरमाए और इन बुराइयों से हमें अपनी पनाह में रखे!

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