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इस्लाम – मानवता के लिए सन्देश

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इस्लाम पिछले कुछ दशकों से चर्चा का विषय बना हुआ है। कुछ इसको मानवता के ख़िलाफ़ और कुछ मानवता के हित में बताते हैं। ये बहस जूं की तूं जारी है। मानवता की जब बात कि जाती है तो आम तौर पर इन बहसों में किसी प्रांत या कुछ विशेष चीज़ों की चार दीवारी बनाकर बात की जाती है जो पूरी तस्वीर देखने के लिए काफ़ी नहीं। इस्लाम जब मानवता की बात करता है तो वो इंसान की बनाई किसी सीमा को नहीं मानता, उसकी नज़र में पूरा विश्व एक देश है और उसमें रहने वाले लोग एक बराबर हैं। मानवता का कोई संदेश जब तक पूरा नहीं हो सकता जब तक ये विभाजन ख़त्म ना किया जाए, इस विभाजन के रहते ये संदेश भेदभाव के सिवा और कुछ नहीं होगा। समस्त मानव जाति के लिए एक नियम बनाकर इस्लाम मानवता का संदेश पूरा करता है। इसकी एक मिसाल यूं समझिए के आम तौर पर सुना जाता है कि ज़रूरत से ज़्यादा जितना हो वो दूसरों की मदद में लगाना चाहिए, तो अब “ज़रूरत” की कोई ऐसी परिभाषा चाहिए जो सारे इंसानों पर बराबर लागू हो सके, इस्लाम का दिया हुआ ज़कात का नियम संपूर्ण परिभाषा देता है।

मानवता का कोई संदेश ऐसा नहीं हो सकता जो सारे इंसानों पर बराबर लागू ना किया जाए, पड़ोसी भूखा हो और आप खाना खा लें तो इस्लाम आप को कटघरे में घसीट लेता है, किसी मासूम की जान लेने को समस्त मानव जाति की हत्या से मिसाल देने वाला इस्लाम दुनिया भर में बसे हुए इंसानों को एक जगह जमा करता है और उनको एक ही संदेश देता है जो आसान भाषा में मानवता  का संदेश ही कहा जाएगा। मानव जाति जिस प्रेम की तलाश में भटक रही है वो इस्लाम के दिए संदेश में आसानी से ढूंढा जा सकता है। बस ज़रूरत है तो पास आकर चीज़ों को समझने की।

क़रीब आओ तो शायद समझ में आ जाए
कि फ़ासले तो ग़लत-फ़हमियाँ बढ़ाते हैं।

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1 thought on “इस्लाम – मानवता के लिए सन्देश

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