इस्लाम भाईचारे का सन्देश देता है।

Islam is Peace Latest
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इस्लाम धर्म पूरी मानव जाति को  एक मां बाप की संतान कह कर हर इंसान को ख़ून के रिश्ते में बांध देता है। इससे बेहतर भाईचारे का कोई और तरीका हो भी नहीं सकता था। अगर ये कहा जाता कि तुम सब एक दूसरे के लिए भाई जैसे हो तो रिश्ते की वो मज़बूती ख़याली नहीं होती। भाई जैसा होने और ख़ूनी रिश्ते का भाई होने में क्या अंतर है। सब भली भांति जानते हैं, यहां इंसानी मिज़ाज की सबसे नाज़ुक रग को दबाते हुए क़ुरान कहता है “लोगों हमने तो तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया” (49:13) यानी दुनिया में तमाम इंसान उतने ही क़रीब हैं जितने एक घर में रहते हुए लोग। अब इस आयत की रोशनी में उस समाज की कल्पना कीजिए जो एक दूसरे के सुख दुख में ऐसे ही शामिल रहे जैसा कि अपने ख़ास लोगों के यहां शामिल रहता हो। क्या ये समाज मिसली समाज नहीं होगा? क्या ये समाज बराबर का अधिकार दिलाने के लिए नहीं लड़ेगा? क्या ऐसे समाज में लोगों का भूख से मर जाने की कल्पना की जा सकती है?

अगर बारीकी से देखा जाए तो समाज में फैला भेदभाव ही भाईचारे के लिए ख़तरा है। इस्लाम इस भेदभाव से ऊपर उठ कर इंसान को उस जगह खड़ा कर देता है जहां नस्ल, जाति, रंग और भाषा की बात पीछे रह जाती है, यही वो उपाय है जो विश्व में भाईचारे की नीव डाल सकता है। वास्तव में यही भेदभाव आगे बढ़ कर समाज में न्याय संस्थानो को प्रभावित करता है और इस प्रकार अन्याय और अपराध को ना सिर्फ़ जन्म देता है बल्कि उसका पालन पोषण भी करता है। इसके विपरीत प्रेम और स्नेह के लिए ज़रूरी है किसी ऐसी बात का होना जो दो लोगों को जोड़ती हो और इस्लाम वही एक मज़बूत कड़ी ख़ून के रिश्ते से जोड़ देता है। क़ुरान और इस्लामिक पुस्तकों में आपको ऐसी ढेरों मिसालें मिल जाएंगी जो भाईचारे को प्रोत्साहित करती हैं लेकिन इस्लाम भाईचारे का संदेश देता है यह सिद्ध करने के लिए ये एक आयत ही काफ़ी है “ऐ लोगों हमने तुम सबको एक मर्द और एक औरत से पैदा किया” (49:13)।

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