इस्लाम और विश्व शांति।

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ज़रा सोचिए के क्या शांति वहां हो सकती जहां हर कोई ख़ुद को दूसरे से बड़ा समझता हो? क्या ये हो सकता है कि दूसरों को ख़ुद से हीन समझते हुए भी हम उनको बराबर मान लें? और क्या ये हो सकता है कि ऊँच नीच के साथ शांति क़ायम हो सके? कभी नहीं हो सकती है। विश्व शांति के लिए सबसे ज़रूरी यही बात है कि ज़मीन पर बनाई हुई रेखाएं सिर्फ़ रेखाएं समझी जाएं, जब ऐसा हो पाए तभी ये ख़ुद को बड़ा समझने की रीत ख़त्म हो पाएगी और इसी के बाद आएगा वो दिन जब सारे इंसान बराबर समझे जा सकेंगे। 

इस्लाम और विश्व शांति पर बात करें तो हमें कहना पड़ेगा कि इस्लाम पूरे विश्व को एक घर की तरह देख कर सारे इंसानों को बराबर का दर्जा देता है। वास्तव में शांति के लिए ज़रूरी है कि इंसाफ़ का बोल बाला क़ायम हो और इंसाफ़ के लिए ज़रूरी है के हर इंसान को बराबर का अधिकार दिया जाए। इस्लाम ने इस संसार में शांति कायम करने के लिए कुछ नियम और सिद्धातं दिए हैं। उसमें से एक सबसे बुनयादी सिद्धांत है कि इस्लाम सारी इंसानियत को एक माता पिता की संतान बता कर विश्व को उस रिश्ते में पिरो देता है जो बराबरी के लिए ज़रूरी है, जहां कोई नस्लवाद न हो, कोई ख़ुद को ऊंचा ना समझे, सब एक ही पायदान पर हो। इसी हालात में न्याय हो सकता है और न्याय की बात बिना विश्व शांति का ख़्वाब अधूरा है। इस्लाम इंसानों को एक बराबर मान कर विश्व शांति की राह की ओर हमारा मार्गदर्शन करता है।

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