Islam and Humanity! Muslim or Human!

इस्लाम और इंसानियत! मुस्लिम या इंसान

Islam is Peace Latest Shuja Khan
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मुस्लमान और इंसान दोनों अरबी शब्द हैं और क़ुरआन में भी ये दोनों शब्द काफी बार आये हैं। आईये एक एक करके दोनों को देखते हैं:

मुस्लमान, एक इंसान की उपाधि है, जन्मसिद्ध अधिकार नहीं। क्योंकि ये एक अरबी शब्द है, इसलिए इसका अर्थ जो अरबी नहीं जानते उनको समझने में दिक्कत होती है, चाहे वह मुस्लिम हों या ग़ैर मुस्लिम। इस्लाम शब्द के दो अर्थ हैं। शांति व संपूर्ण आत्म समर्पण। सबके मालिक के प्रति ऐसा समर्पण कि उसकी मर्ज़ी के सामने अपनी हर इच्छा समर्पित हो जाए! इस्लाम को ग्रहण करने वाला मुस्लिम है। मालिक की सृष्टि से नफ़रत करने वाला मुस्लिम नहीं हो सकता।

मालिक ने इन्सान को संसार में क्यों पैदा किया? उसकी मानव जाती से क्या अपेक्षा है? हमारा लक्ष्य क्या हो, ज़िम्मेदारियाँ क्या हैं? यह जानना प्रत्येक मानव का कर्तव्य है! अनुमान प्रायः ग़लत होते हैं। उसने समय समय पर मार्गदर्शन के लिए पृथ्वी के हर क्षेत्र में मानव जाती में ईशदूतों को जन्म देकर अपनी वाणी उनपर अवतरित की। सभी ईशदूत सच्चे थे और अपने अपने क्षेत्र की भाषाओँ व अपने समय की शैली में सब ने ईश्वर का एक ही सन्देश मानव जाती को पहुँचाया। जो व्यक्ति ईश्वाणी के प्रतिकूल अपनी इच्छाओं पर चले वह सरकारी रिकॉर्ड में तो मुस्लमान हो सकता है, ईश्वर की सूची में नहीं। मुस्लिम वह है जो पूरी तरह इस्लाम में आगया हो और ‘इस्लाम अरबी शब्द ‘सल्म से बना है जिसका एक अर्थ है ‘शान्ति’। इस प्रकार मुस्लिम का अर्थ हुआ शान्ति फैलाने वाला या शान्ति की स्थापना करने वाला, शान्तिप्रिय। जो अशान्ति फैलाए वह मुस्लिम नहीं हो सकता। इसी प्रकार इस्लाम का आधार ‘ईमान (आस्था) है और ‘ईमान‘अमन से बना है। इसका अर्थ भी शान्ति है। एक मुस्लमान में ईमान का होना ज़रूरी है। यदि मुस्लमान में ईमान नहीं तो चाहे वह कितना भी बड़ा मुसलमान कहलाये लेकिन इस्लाम की दृष्टि में वह न आस्तिक है न मुस्लिम! ईमान और इस्लाम के साथ क़ुरआन अमल-ए- सालेह (सुकर्म) को भी कामयाबी के लिये ज़रूरी बताता है। ‘सालेह’ (नेक और अच्छा) शब्द का मूल ‘सुलह’ (संधि) है।  अमल-ए सालेह का अर्थ है ऐसा अमल (काम) जो सुलह अर्थात शान्ति के लिए किया जाए। इस प्रकार क़ुरआन पूरी तरह शान्ति का ही पैग़ाम और संदेश है। जो क़ुरआन पर सच्चाई से अमल करेगा वह शान्ति का ध्वजारोहक होगा। अशांति फैलाने वाला क़ुरआन का अनुयायी नहीं हो सकता।

जब हम इस्लाम की शिक्षाओं का अध्यन करते हैं तो देखते हैं कि इस्लाम कि शिक्षाएं मानवता के अनुकूल हैं। क़ुरआन ने अल्लाह को सारे संसारों का कहा -क़ुरआन (1:1), पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) को तमाम संसारों के लिए करुणा (रहमत) कहा – क़ुरआन (21:107), और क़ुरआन को तमाम इंसानों के लिए मार्गदर्शन कहा – क़ुरआन (2:185)

ये समझना बिल्कुल अज्ञानता होगी कि ईश्वर (अल्लाह), उसके पैग़म्बर, और उसका ग्रन्थ किसी एक समुदाय के लिए बल्कि वो समस्त मानवता के लिए हैं। साथ ही क़ुरआन ने इस बात को बार बार याद दिलाया की समस्त मानवता एक है और उसके पूर्वज भी एक ही हैं और इसलिए जाती, रंग, नस्ल, भाषा आदि के आधार पर कोई भेद भाव नहीं किया जायेगा, क़ुरआन कहता है:

ऐ इंसानों! हमनें तुम्हें एक पुरुष और एक स्त्री से पैदा किया और तुम्हें बिरादरियों और क़बिलों का रूप दिया, ताकि तुम एक-दूसरे को पहचानो। वास्तव में अल्लाह के यहाँ तुममें सबसे अधिक प्रतिष्ठित वह है, जो तुममे सबसे अधिक तक़वा (ईश्वर प्रेम) रखता है। निश्चय ही अल्लाह सबकुछ जाननेवाला, ख़बर रखनेवाला है। (क़ुरआन 49:13)

सारे मनुष्य एक ही समुदाय थे (क़ुरआन 2:213)

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.)  ने फ़रमाया, सारे प्राणी (मख्लूक़) अल्लाह का परिवार है और अल्लाह उससे प्रेम करता है जो उसके परिवार के साथ रहमत (करुणा) का सलूक करता है। (मिश्कत)

पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.)  से एक इंसान से पूछा कि अल्लाह किस पर अपनी रहमत करता है: पैग़म्बर मुहम्मद ने फ़रमाया जो इंसान लोगो से साथ भलाई करता है।

सिर्फ आम इंसानों के साथ नहीं, इस्लाम तो दुश्मनों के साथ भी भलाई और इंसाफ़ की बात करता है। क़ुरआन कहता है: ऐ ईमान लेनेवालो! अल्लाह के लिए खूब उठनेवाले, इनसाफ़ की निगरानी करनेवाले बनो और ऐसा न हो कि किसी गिरोह की शत्रुता तुम्हें इस बात पर उभार दे कि तुम इनसाफ़ करना छोड़ दो। इनसाफ़ करो, यही परहेज़गारी से अधिक निकट है। अल्लाह का डर रखो, निश्चय ही जो कुछ तुम करते हो, अल्लाह को उसकी ख़बर हैं (5:8)

इंसाफ़ (न्याय) आईये एक और क़ुरआन की आयत को देखें: ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह के लिए गवाही देते हुए इनसाफ़ पर मज़बूती के साथ जमे रहो, चाहे वह स्वयं तुम्हारे या तुम्हारे अपने या माँ-बाप और नातेदारों के विरुद्ध ही क्यों न हो। कोई धनवान हो या निर्धन (जिसके विरुद्ध तुम्हें गवाही देनी पड़े) अल्लाह को उनसे (तुमसे कहीं बढ़कर) निकटता का सम्बन्ध है, तो तुम अपनी इच्छा के अनुपालन में न्याय से न हटो, क्योंकि यदि तुम हेर-फेर करोगे, तो जो कुछ तुम करते हो अल्लाह को उसकी ख़बर रहेगी (सूरह निसा – 4:135)

क़ुरआन ने यहाँ तक कहा कि भलाई के कामों में सबका साथ देना, और बुराई और ज़्यादती के कामों में अपनों का साथ भी न देना और नेकी और अवज्ञा से बचने में तुम सबका सहयोग करो और हक़ मारने और ज़्यादती के काम में किसी का सहयोग न करो। (5:2)

पैग़मबर मुहम्मद (सल्ल.)  ने अपने आख़िरी ख़ुत्बे (कथन) ने फ़रमाया:
किसी अरबी को किसी अजमी (ग़ैर-अरबी) पर कोई बड़ाई नहीं, न किसी अजमी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर, न काले को गोरे पर, प्रमुखता अगर किसी को है तो सिर्फ तक़वा व परहेज़गारी से है अर्थात् रंग, जाति, नस्ल, देश, क्षेत्र किसी की श्रेष्ठता का आधार नहीं है। बुखारी (1623)

इस्लाम इंसानियत को एक समुदाय बताता है, इसलिए जिस इंसान में इंसानियत नहीं वह मुस्लिम यानि ईश्वर भक्ति नहीं।

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