इस्लाम: अक्लमंदों का दीन

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हम अक्सर धार्मिक लोगों के मुंह से ये जुमला सुनते हैं कि धर्म के मामले में अक्ल का इस्तेमाल नहीं किया जाता, अब क्योंकि मैं इस्लाम की बात करने वाला हूं तो बात मुस्लिमों की करूंगा। कुछ मुस्लिमों के दरमियान भी ये जुमला बड़ा आम है कि “दीन के मामले में अक्ल का इस्तेमाल नहीं करते हैं, अरे! अक्ल का इस्तेमाल करोगे तो गुमराह हो जाओगे।”, इसके भी दो पहलू हैं, अक्ल का इस्तेमाल गलत तरीके से किया जाए तो ज़रूर इंसान को नुक्सान उठाना पड़ सकता है, लेकिन अपने आप में दीन के मामले में हम अक्ल के इस्तेमाल को गलत नहीं ठहरा सकते, क्योंकि क़ुरआन इकलौती ऐसी किताब है, जिसने अक्ल के इस्तेमाल पर बेपनाह ज़ोर दिया है, बल्कि इतना ज़ोर दिया है, जिसके आस पास भी किसी और किताब ने नहीं दिया। अब मैं ये बात कह रहा हूं तो ज़ाहिर है अपने पास से नहीं कह रहा, इस्लाम वाकई अक्ल के इस्तेमाल और गौरो फ़िक्र करने पर आखिरी दर्जे का ज़ोर देता है। क़ुरआन में अक्ल के इस्तेमाल पर इतनी आयतें हैं कि मैं उन सब को लिखना शुरू करूं, तो एक किताब उन्हीं आयात पर लिखी जा सकती है, लेकिन मैं केवल कुछ आयात यहां पेश करूंगा।

वह जिसको चाहता है हिकमत दे देता है और जिसको हिकमत मिली उसको यक़ीनन बहुत बड़ी दौलत मिल गई, और नसीहत वही हासिल करते हैं जो अक़्ल वाले हैं। क़ुरआन (2:269)

आसमानों और ज़मीन की पैदाइश में और रात-दिन के बारी-बारी आने में अक़्ल वालों के लिए बहुत निशानियाँ हैं। क़ुरआन (3:190)

ऐ मेरी क़ौम! मैं इस पर तुमसे कोई अज्र नहीं माँगता, मेरा अज्र तो उसी पर है जिसने मुझे पैदा किया है, क्या तुम अक्ल का इस्तेमाल नहीं करते। क़ुरआन (11:51)

जो शख़्स यह जानता है कि जो कुछ आपके रब की तरफ़ से आप पर उतारा गया है वह हक़ है क्या वह उसके मानिंद हो सकता है जो अंधा है, नसीहत तो अक़्ल वाले लोग ही क़बूल करते हैं। क़ुरआन (13:19)

यह लोगों के लिए एक ऐलान है और ताकि इसके ज़रिए वह डरा दिए जाएं, और ताकि वे जान लें कि वही एक माबूद है और ताकि अक़्लमंद लोग नसीहत हासिल करें। क़ुरआन (14:52)

यह एक किताब है जो हम ने तुम्हारी ओर अवतरित की है ताकि वे इस की आयतों पर सोच-विचार करें और ताकि बुद्धि और समझ वाले इससे शिक्षा ग्रहण करें। क़ुरआन (38:29)

कहो, “क्या वे लोग जो जानते हैं और वे लोग जो नहीं जानते दोनों समान होंगे? शिक्षा तो बुद्धि और समझ वाले ही ग्रहण करते हैं। क़ुरआन (39:9)

इनके अलावा क़ुरआन की कुछ आयात खास ध्यान देने की हैं, कि क़ुरआन ने अक्ल के इस्तेमाल पर किस दर्जे का ज़ोर दिया है। एक जगह तो अल्लाह ने फरमाया कि जो अक्ल का इस्तेमाल नहीं करता, अल्लाह उन पर और गंदगी डाल देता है, मतलब उन्हें उन्हीं की बुराईयों में और डूबने के लिए छोड़ देता है। देखें:

और किसी शख़्स के लिए मुमकिन नहीं कि वे अल्लाह की इजाज़त के बग़ैर ईमान ला सके, और अल्लाह उन लोगों पर गंदगी डाल देता है जो अक़्ल से काम नहीं लेते। क़ुरआन (10:100)

एक जगह तो ईमान वालों को मुखातिब ही अक्ल वाला कह कर किया है। देखें:

अल्लाह ने उन के लिए कठोर यातना तैयार कर रखी है। अतः ऐ बुद्धि और समझ वालो जो ईमान लाए हो! अल्लाह का डर रखो। अल्लाह ने तुम्हारी ओर एक याददिहानी उतार दी है क़ुरआन (65:10)

जहां तक मेरी जानकारी में है, कम से कम दो जगह अल्लाह ने अक्ल का इस्तेमाल ना करने वालों और सोच विचार ना करने वालों को बदतरीन जानवर बल्कि उनसे भी बदतर बताया है। देखें:

और हमने जिन्नात और इंसान में से बहुतों को जहन्नम के लिए पैदा किया है, उनके दिल हैं

जिनसे वे समझते नहीं, उनकी आँखें हैं जिनसे वे देखते नहीं और उनके कान हैं जिनसे वे सुनते नहीं, वे ऐसे हैं जैसे चौपाये बल्कि उनसे भी ज़्यादा बे-राह, यही लोग ग़ाफ़िल हैं। क़ुरआन (7:179)

यक़ीनन अल्लाह के नज़दीक बदतर जानवर वे बहरे-गूँगे लोग हैं जो अक़्ल से काम नहीं लेते। क़ुरआन (8:22)

आखिर में एक ख़ास आयत और रखूंगा, जहां अल्लाह ने आखिरत (परलोक) का इशारा करते हुए बताया है, कि जहन्नम (नरक) वाले इस बात को खुद कहेंगे कि हम अक्ल से काम लेते तो जहन्नम (नरक) में ना जाते। देखें:

और वे कहेंगे, “यदि हम सुनते या अक्ल से काम लेते तो हम दहकती आग में पड़ने वालों में सम्मिलित न होते।” क़ुरआन (67:10)

तो इन सब को पढ़ने के बाद कौन ये कहेगा कि इस्लाम अक्ल के इस्तेमाल पर ज़ोर नहीं देता। हां ये ज़रूर है कि हमें इसमें भी अपनी अक्ल का इस्तेमाल करना है, कि अक्ल के इस्तेमाल का नाम लेकर कोई हमें बेवकूफ तो नहीं बना रहा, क्योंकि अक्ल के इस्तेमाल का दावा तो नास्तिक भी करते हैं, जो खुदा के वजूद का ही इनकार कर देते हैं। तो अक्ल का इस्तेमाल हमें ज़रूर करना है, लेकिन उसी अक्ल के दायरे में उन तमाम दूसरे पहलुओं को भी रखना है जो दीन को समझने के लिए ज़रूरी हैं। अहले इल्म ने जो गौरो फ़िक्र किया है, उन से भी फायदा उठाना है। ये नहीं करना कि पूरी उम्मत को एक तरफ रख के, क़ुरआन खोल के अपनी मन मर्ज़ी की तावीलात शुरू कर दी जाएं, नहीं! वो फिर दूसरी एक्सट्रीम है, वहां से नई गुमराहियों का रास्ता खुल जाता है। बल्कि हर चीज़ पर अहले इल्म की तहकीक भी पढ़नी है, उनको नज़र में रख कर क़ुरआन का तर्जुमा भी पढ़ना है, और अगर हो सके तो ज़रूर अरबी सीख कर खुद उसमें गौरो फ़िक्र करना है, फिर अपनी अक्ल का इस्तेमाल करना है, कि कौन सी राय हकीकी तौर पर सही मालूम हो रही है। हो सकता है उसमें भी दो लोगों में इख़तेलाफ हो जाए, पर अपने इरादों को अच्छा रखना है, नीयत को ख़ालिस रखना है, क्योंकि अल्लाह नीयत पर फैसला करता है। पर अपनी अक्लों में ताले लगाकर किसी की अंधी पैरवी नहीं करनी, वो फिर धर्म नहीं होता, वो अंधविश्वास होता है। तो मेरे ख्याल में यहां तक बात क्लियर हो गई होगी, कि इस्लाम अक्ल के इस्तेमाल पर कितना ज़ोर देता है। दो मोटी बातें समझ लें जो यहां गौर करने की हैं; उनमें पहली ये कि इस्लाम अंधी पैरवी को सख्ती से मना करता है, और अक्ल के इस्तेमाल पर बोहोत ज़ोर देता है। और दूसरी ये कि सिर्फ अपनी अक्ल की बुनियाद पर इतिहास के तमाम बड़े बड़े अहले इल्म को बेवकूफ समझना भी अपने आप में एक बेवकूफी ही है, हालांकि ऐसा करने वाले इस को अपनी अक्लमंदी ही समझ रहे होते हैं। बस यहीं अपनी बात को खत्म करूंगा।

अल्लाह राह ए हक़ की तरफ हमारी रहनुमाई फरमाए। आमीन।

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Muhammad Amir Ansari
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