ईमान वालो, ईमान लाओ!

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आज पूरी दुनिया में मुसलमानों की संख्या 180 करोड़ हैं, लेकिन क्या इतनी ही संख्या ईमान वालों की भी है? हम ये समझते हैं की जो इंसान मुस्लिम घर में पैदा हुआ या जिसने कलमा पढ़ा वह ईमान वाला है। लेकिन क्या ये 180 करोड़ मुस्लमान अल्लाह की फेहरिस्त (सूचि) में भी मुस्लिम हैं? में यहाँ किसे के ईमान पर कोई ऊँगली नहीं उठा रहा, न में ऐसा करने का हक़ रखता हूँ। लेकिन में आपके सामने क़ुरआन के कुछ उसूल पेश करना चाहता हूँ, जिस से हम अपना जायज़ा ख़ुद लें और कोशिश करें की हम सब वैसे ईमान लाये जैसा अल्लाह ने चाहा, जैसा इस क़ायनात के बनाने वाले को मतलूब है।

क़ुरआन ने जगह जगह ईमान का दावा करने वालो से कहा, “ऐ ईमान वालो, ईमान लाओ! “ क्या हमने कभी ये सोचा की अल्लाह हम से ऐसा क्यों कह रहा है? एक मिसाल से समझें की कोशिश करें। फ़र्ज़ लीजिये आपके शहर में 4 डॉक्टर हैं जिनका सरनेम (Surname / उपनाम) ख़ान है। इन चारों डॉक्टर के बच्चों का सरनेम भी ख़ान होगा। ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए, क्योंकि ये एक नस्ली नाम है, जो उनकी नसल हो दर्शाता है, यानि इन चारो डॉक्टर के बच्चे पैदाइश से ही ख़ान होंगे। लेकिन अगर में कहूं कि ये बच्चे पैदाइश से डॉक्टर भी होंगे और पैदाइश की वजह से हमें इन्हे डॉक्टर भी मान लेना चाहिए, तो क्या आप मेरी बात पर हसेंगे नहीं?

जिस तरह पैदाइश से कोई डॉक्टर नहीं होता उस ही तरह पैदाइश से कोई मुस्लिम भी नहीं होता। मुस्लिम होना कोई नस्ल की बात नहीं, बल्कि मुस्लिम तो इंसान की वह विशेषता है जिससे वह अपने बनाने वाला मालिक के सामने सम्पूर्ण आत्मा समर्पण करके शांति में आजाये। जिस तरह पैदाइश से कोई डॉक्टर नहीं होता उस ही तरह पैदाइश से कोई मुस्लिम भी नहीं होता। मुस्लिम होना कोई नस्ल की बात नहीं, बल्कि मुस्लिम तो इंसान की वह विशेषता है जिससे वह अपने बनाने वाला मालिक के सामने सम्पूर्ण आत्मा समर्पण करके शांति में आजाये।

मुस्लमान ज़बान से तो कहते हैं की वह ईमानवाले हैं, लेकिन क्या उन्हें याद है की वह कब ईमान में आये थे? जिस तरह एक इंसान डॉक्टर बना क्या उस ही तरह हम भी ईमानवाले बने और क्या हमे ये याद है की ऐसा कब हुआ? आईये अब आपको क़ुरआन की एक आयत बताता हूँ, क़ुरआन ने कहा:

ऐ ईमान लानेवालो! अल्लाह पर ईमान लाओ और उसके रसूल पर और उस किताब पर जो उसने अपने रसूल पर उतारी है… (4:136)

इस आयत में “ईमानवालो अल्लाह और रसूल पर ईमान लाओ” किस से कहा जा रहा है? क़ुरआन यहाँ ईमानवालो से कह रहा है – ईमान लाओ।  बहुत ग़ौर करने का मक़ाम है, अगर आपसे कहा जाये की अल्लाह पर ईमान लाओ तो आप कहेंगे, हम ईमान वाले ही हैं, हम तो पैदाइशी मुस्लमान हैं। यही बात आप तब कहेंगे जब आपसे कोई कहे कि रसूल और क़ुरआन पर भी ईमान लाओ। और वो लोग भी यही बात कहेंगे जिन्हे क़ुरआन का एक लफ्ज़ भी पढ़ना नहीं आता। तो फिर अल्लाह ने ये किससे कहा की “ऐ ईमानवालों ईमानलाओ?” क्या ये बात फिर किसे से नहीं कही गई या हर उस शख़्स से ये बात कही गई जो अपने आपको ईमान वाला कहता है? इस आयत में अल्लाह ने हर उस इंसान को ख़िताब किया जो अपने आपको ईमानवाला कहता है, इस बुनियाद पर की वो मुस्लिम घराने में पैदा हुआ। उन सबसे अल्लाह ने कहा पहले ईमान लाओ, नस्ली बुनियाद पर कोई ईमान वाला नहीं होता जब तक वह ईमान न लाये।

अल्लाह ने फलह (कामयाबी) के लिए जो उसूल बताये हैं, इंसान उन्ही उसूलों पर चल कर कामयाब हो सकता। ये सवाल अपने आप से पूछिए क्या इस बात का दिल की गहरायी से यक़ीन है? अगर हाँ, तो फिर अल्लाह के उसूलों के खिलाफ काम क्यों किये जाते हैं? अव्वल तो मुसलमानों की भीड़ इन उसूलों को जानती ही नहीं, तो जो अल्लाह के बताये हुए उसूलों को ही न जानता हो, क्या वो इन उसूलों पर यक़ीन रख सकता है? इस लिए क़ुरआन ने कहा, “ईमान वालो ईमान लाओ!”

पहले इन उसूलों को जाने और फिर उस पर दिल की गहरायी से यक़ीन करें की कामयाबी का रास्ता इन्ही उसूलों में है और इसके ख़िलाफ़ अमल सिर्फ तबाही की तरफ ले जाता है। क़ुरआन ने बताया ईमान के साथ सरबुलन्दी आती है:

हताश न हो और दुखी न हो, यदि तुम ईमानवाले हो, तो तुम्हीं प्रभावी रहोगे (3:139)

इस बात का यक़ीन की अल्लाह के बताये हुए उसूल हक़ हैं और उनपर अमल करके ही कामयाबियां मिलेगा। क्या अगर इस बात पर यक़ीन होता तो हम कामयाब या सरबुलन्द न होते?

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