ग़ैर मुसलमानो की ग़लतफ़हमियाँ दूर करने के लिए मुसलमानों को क्या करना होगा?

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जब अल्लाह समस्त मानव जाति की तरफ़ अपने आख़री रसूल भेजा तो उसने  उसके बाद आने  वाले तमाम इंसानों के लिए आख़री रसूल को ही मार्गदर्शक बना दिया।  वास्तव में ये सवाल यूं तो बहुत पुराना है लेकिन बदलते समय के साथ ये सवाल और भी ज़रूरी हो जाता है कि “ग़ैर मुसलमानो की ग़लतफ़हमियाँ दूर करने के लिए मुसलमानों को क्या करना होगा?” आज के संदर्भ में ये सवाल सबसे ज़रूरी है क्या इस्लाम और मुसलमानों के लिए विश्व भर में नफ़रत का माहौल बनाया जा रहा है। तो इस सवाल के जवाब को लेकर जब हम रसूल की ओर देखते हैं तो सीधा और स्पष्ट उत्तर हमें क़ुरान में मिलता है, क़ुरान उत्तर देते हुए एक नियम बताता है जो हर काल में प्रयोग में लाया जा सकता है “अपने रब के मार्ग की ओर तत्वदर्शिता और सदुपदेश के साथ बुलाओ और उनसे ऐसे ढंग से वाद विवाद करो जो उत्तम हो” (16:125)।

इस्लाम के सिद्धांत क्योंकि विज्ञान के विपरीत नहीं हैं इसलिए तार्किक तरीके़ से इनको समझना आसान है। नास्तिक लोगों में धर्म के प्रति एक भ्रम है जिसके अनुसार कि धर्म और तर्क साथ नहीं चल सकते। इस भ्रम का भी उत्तर यही है कि संवाद हो। अब इसकी मिसाल यूं समझिए कि विश्व के ना जाने कितने देश आपसी झगड़ो को लेकर अंतरराष्ट्रीय न्यायालय या संयुक्त राष्ट्र जाते हैं। यहां उन मुद्दों पर वाद विवाद किया जाता है जो दोनों देशों में दरार का कारण बनी हुई हैं। इसके अलावा विज्ञान के बढ़ते असर से हर चीज़ तर्क की बुनियाद पर परखी जाने लगी है। तो अब ये ज़रूरी है कि ग़ैर मुसलमानो की ग़लतफ़हमियाँ का जवाब संवाद के सहारे एक मनोवैज्ञानिक की तरह खूब समझ बूझ कर उसी की ज़बान में दिया जाए।

ग़ैर मुसलमानो की ग़लतफ़हमियाँ अभी तक जूं की तुं होने का एक कारण ये भी है कि मुसलमान ने आज तक उस तीव्रता से इस्लाम का संदेश देने का प्रयत्न ही नहीं किया जिस तीव्रता से ये ग़लतफ़हमियाँ फैलाई गई हैं। हमने आज तक इन सवालों को साज़िश समझ कर अनदेखा किया है, जिससे ये दूरी और बढ़ गई है। इस्लामिक विद्वान मौलाना अबुल हसन नदवी फ़रमाते थे “मुसलमानों को चिकित्सक की तरह ग़ैर मुसलमानो को देखना चाहिए” यानी जैसे एक चिकित्सक अपने रोगी की हमदर्दी की नज़र से देखता है उसी प्रकार हमें भी करना चाहिए। अब ज़रा कुछ पल के लिए कल्पना कीजिए के चिकित्सक ये सोच ले कि मरीज़ मेरी दुश्मनी में कराह रहा है तो क्या इलाज हो सकता है? नहीं।

जो विडंबना है वो शायद जौन एलिया के इस शेर में भली भांति नज़र आती है:
एक ही हादसा तो है और वो ये कि आज तक
बात नहीं कही गई बात नहीं सुनी गई।

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