Coronavirus की वजह से नमाज़ घर में या मस्जिद में?

Ibadat
Share this post
  • 151
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    151
    Shares

आज हम देखते हैं कि एक बहुत बड़ी त्रासदी पूरी दुनिया में फैली हुई है, और दिन-ब-दिन वो और ज़्यादा खतरनाक रूप लेती जा रही है, उसका नाम बताने की ज़रूरत नहीं, आप सब समझ चुके होंगे, जी हां! मैं कोरोना वायरस के बारे में बात कर रहा हूं, जो चीन से शुरू हुआ था, और आज कई देशों में और हमारे देश भारत में भी अच्छी तरह पैर जमा चुका है, और अब मामला जिलों और राज्यों के लॉक डॉउन तक आ गया है। हालांकि ये वायरस अपने आप में उतना खतरनाक नहीं है, लेकिन इसका इलाज ना होने और इसके तेज़ी से फैलने की वजह से ये बहुत खतरनाक रूप के चुका है, और ज़ाहिर है जब बात लॉक डॉउन की हो रही है, तो मस्जिदों की बात तो ज़रूर आएगी और आ रही हैं। ऐसे में मुस्लिम खुद को एक ऐसी मुश्किल हालत में महसूस कर रहे हैं, जहां सब की अलग अलग राय हैं, और अपने अपने मसले हैं। ये बात अपनी जगह हकीकत है कि ये जो वायरस है इसका कोई इलाज तो है नहीं, इससे बचने का वाहिद रास्ता यही है, कि खुद को घर में बंद रखा जाए और बाहर निकलने को बिना इंतेहाई ज़रूरियात के पूरी तरह बंद कर दिया जाए। तो फिर उन लोगों का क्या होगा जो पांचों वक़्त की नमाज़ जमात के साथ पढ़ते हैं। बहरहाल घबराएं नहीं, मैं खुद उन्हीं लोगों में से हूं, कभी कभी ऐसा होता है कि मेरी जमात छूट जाती है, वरना मैं पांचों नमाज़ें अक्सर जमात से ही पढ़ता हूं, तो ये माहौल मेरे लिए भी खतरनाक होने के साथ साथ अल्लाह के खौफ का बाईस भी है, क्योंकि मैं भी जमात नहीं छोड़ना चाहता। लेकिन यहां हम इस मसले को शरीयत के दायरे में देखेंगे, कि शरीयत इस पर क्या कहती है? क्या नबी ﷺ की ज़िंदगी में हमें इस मसले पर कोई रहनुमाई मिलती है? क्योंकि क़ुरआन कहता है:

لَقَدۡ کَانَ لَکُمۡ فِیۡ رَسُوۡلِ اللّٰہِ اُسۡوَۃٌ حَسَنَۃٌ لِّمَنۡ کَانَ یَرۡجُوا اللّٰہَ وَ الۡیَوۡمَ الۡاٰخِرَ وَ ذَکَرَ اللّٰہَ کَثِیۡرًا

बेशक तुम्हारे लिए अल्लाह के रसूल में एक बेहतरीन नमूना है, हर उस इंसान के लिए जो अल्लाह और आखिरत के दिन की उम्मीद रखता है, और अल्लाह को बकसरत याद करता है।
★क़ुरआन (33:21)

या अगर खुद नबी ﷺ का अमल तो नहीं पर कोई हुक्म भी मौजूद है तो उस की पैरवी करना हमारे ईमान का, अल्लाह से मुहब्बत का और क़ुरआन पर ईमान का तकाज़ा है, क्योंकि क़ुरआन कहता है:

قُلۡ اِنۡ کُنۡتُمۡ تُحِبُّوۡنَ اللّٰہَ فَاتَّبِعُوۡنِیۡ یُحۡبِبۡکُمُ اللّٰہُ وَ یَغۡفِرۡ لَکُمۡ ذُنُوۡبَکُمۡ ؕ وَ اللّٰہُ غَفُوۡرٌ رَّحِیۡمٌ
(ऐ नबी) कह दीजिए कि अगर तुम अल्लाह से मुहब्बत करते हो तो मेरी पैरवी करो, अल्लाह भी तुमसे मुहब्बत करेगा और तुम्हारे गुनाहों को माफ़ कर देगा, और अल्लाह बड़ा माफ़ करने वाला है, बड़ा मेहरबान है।
★क़ुरआन (3:31)

अब देखते हैं कि इस माहौल में नबी ﷺ की क्या हिदायत हैं, ताकि वो हमारी रहनुमाई का सबब बन सकें, सबसे पहले तो ये समझ लें कि 1400 साल पहले नबी ﷺ ने इस तरह की महामारी से बचने का एक बुनियादी उसूल बता दिया था, उस वक़्त में एक महामारी बहुत आम थी, जिसको ताऊन के नाम से जाना जाता था। आज जिस को आम तौर पर प्लेग के नाम से जानते हैं, उस पर नबी ﷺ का हुक्म मौजूद है कि अगर किसी जगह ताऊन फैल जाए तो जो वहां है वो वहीं रहेगा, बाहर नहीं जाएगा, और किसी और जगह से कोई बाहर वाला कोई अंदर नहीं आएगा, देखें:

حَدَّثَنَا حَفْصُ بْنُ عُمَرَ ، حَدَّثَنَا شُعْبَةُ ، قَالَ : أَخْبَرَنِي حَبِيبُ بْنُ أَبِي ثَابِتٍ ، قَالَ : سَمِعْتُ إِبْرَاهِيمَ بْنَ سَعْدٍ ، قَالَ : سَمِعْتُ أُسَامَةَ بْنَ زَيْدٍ ، يُحَدِّثُ سَعْدًا ، عَنِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ أَنَّهُ قَالَ : إِذَا سَمِعْتُمْ بِالطَّاعُونِ بِأَرْضٍ فَلَا تَدْخُلُوهَا ، وَإِذَا وَقَعَ بِأَرْضٍ وَأَنْتُمْ بِهَا فَلَا تَخْرُجُوا مِنْهَا

नबी करीम ﷺ ने फरमाया: कि जब तुम सुन लो कि किसी जगह ताऊन की वबा फैल रही है तो वहां मत जाओ, लेकिन जब किसी जगह ये वबा फूट पड़े, और तुम वहां मौजूद हो तो उस जगह से निकलो भी मत।
★सही बुखारी (5728)
★कुछ और रेफरेंस:
बुखारी (3473, 6974)
मुस्लिम (5772, 5779)
तिरमज़ी (1065)

इसमें एक बात समझ लें, कि कोई थोड़ी भी अक्ल रखने वाला ये बात समझ लेगा, कि नबी ﷺ ये हुक्म क्यों दे रहे हैं, और जो मैंने दूसरे रेफरेंस दिए हैं हदीसों के, उनमें तो यहां तक है कि उससे बचने की वजह से उस जगह को छोड़ कर ना भागें, बल्कि वहीं रहें। नबी ﷺ के ये हुक्म देने का साफ मकसद ये था, कि वो बीमारी एक से दूसरे में फैल ना सके, अब उसी मकसद की छोटे लेवल पर आएं, तो आपस में एक दूसरे से भी दूर रहना है हमें, क्योंकि मकसद वही था, कि बीमारी ना फैले। इस मसले के सबूत में मैं एक हदीस और रखूंगा यहां, हालांकि नबी ﷺ ने बीमार ऊंटों को सेहतमंद ऊंटों के साथ ना छोड़ने का हुक्म देकर भी इसका इशारा दे दिया था, देखें:

حَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ،‏‏‏‏ حَدَّثَنَا عَلِيُّ بْنُ مُسْهِرٍ،‏‏‏‏ عَنْ مُحَمَّدِ بْنِ عَمْرٍو،‏‏‏‏ عَنْ أَبِي سَلَمَةَ،‏‏‏‏ عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ،‏‏‏‏ قَالَ:‏‏‏‏ قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ:‏‏‏‏ لَا يُورِدُ الْمُمْرِضُ عَلَى الْمُصِحِّ

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: बीमार ऊंटों को तंदरुस्त ऊंटों के पास ना जाने दिया जाए।
★इब्न ए माजा (3541)

पर मैं आपको खुद नबी ﷺ के साथ पेश आया एक वाक़िआ बताता हूं, इस में आप सकी़फ के वफद से नबी ﷺ के बैत लेने के अमल पर गौर कीजिए, देखें:

حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ يَحْيَى، أَخْبَرَنَا هُشَيْمٌ، ح وَحَدَّثَنَا أَبُو بَكْرِ بْنُ أَبِي شَيْبَةَ، حَدَّثَنَا شَرِيكُ بْنُ عَبْدِ اللهِ، وَهُشَيْمُ بْنُ بَشِيرٍ، عَنْ يَعْلَى بْنِ عَطَاءٍ، عَنْ عَمْرِو بْنِ الشَّرِيدِ، عَنْ أَبِيهِ، قَالَ: كَانَ فِي وَفْدِ ثَقِيفٍ رَجُلٌ مَجْذُومٌ، فَأَرْسَلَ إِلَيْهِ النَّبِيُّ صَلَّى اللهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ «إِنَّا قَدْ بَايَعْنَاكَ فَارْجِعْ»

अम्र बिन शरीद ने अपने वालिद से रिवायत की, कहा: सकी़फ के वफद में कोढ़ का एक मरीज़ भी था, रसूलुल्लाह ﷺ ने उस को पैग़ाम भेजा: हम ने तुम्हारी बैत ले ली है, इस लिए तुम लौट जाओ।
★सही मुस्लिम (5822)
★इब्न ए माजा (3544)

इससे साफ पता चलता है, कि फैलने वाली बीमारियों को लिए हुए शख्स से दूर रहना ही नबी ﷺ की तालीम और सुन्नत है, और अक्लमंदी का तकाज़ा भी यही है। और क्या आप जानते हैं कि ऐसे शख्स से किस तरह भागने का हुक्म मौजूद है? देखें ज़रा:

وَقَالَ عَفَّانُ ، حَدَّثَنَا سَلِيمُ بْنُ حَيَّانَ ، حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ مِينَاءَ ، قَالَ : سَمِعْتُ أَبَا هُرَيْرَةَ يَقُولُ ، قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : لَا عَدْوَى وَلَا طِيَرَةَ ، وَلَا هَامَةَ وَلَا صَفَرَ ، وَفِرَّ مِنَ الْمَجْذُومِ كَمَا تَفِرُّ مِنَ الْأَسَدِ
رسول اللہ صلی اللہ علیہ وسلم نے فرمایا کہ چھوت لگنا، بدشگونی لینا، الو کا منحوس ہونا اور صفر کا منحوس ہونا یہ سب لغو خیالات ہیں البتہ جذامی شخص سے ایسے بھاگتا رہ جیسے کہ شیر سے بھاگتا ہے۔

रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: छूत लगना, बदशगुनी लेना, उल्लू का मनहूस होना और सफर का मनहूस होना ये सब लगू ख्यालात हैं (मतलब ऐसा कुछ नहीं होता), अलबत्ता जज़ामी (कोढ़ी) शख्स से ऐसे भागते रहो, जैसे कि शेर से भागते हो।
★सही बुखारी (5707)

तो नबी स० ने इससे भागने को कहा, क्योंकि वो बीमारी अल्लाह के कानून के तहत एक से दूसरे में फैलती है, हमें अल्लाह के हुक्म पर अमल करके इस तरह की बीमारियों से बचने की कोशिश करना चाहिए, कोशिश के बाद फिर अल्लाह मालिक है, जैसी उसकी मर्ज़ी!
हां! तो ऊपर ताऊन की महामारी की बात हो रही थी, तो यहां आगे बढ़ने से पहले उसके बारे में एक हदीस और रखना चाहता हूं, जो दिल के लिए बड़ी तसल्लीबख्श मालूम होती है, और ईमान वालों की ईमानियात बढ़ा देती है, नबी ﷺ ने उस वबा में मरने वाले ईमान वाले को शहादत की बशारत दी है, देखें:

حَدَّثَنَا مُوسَى بْنُ إِسْمَاعِيلَ ، حَدَّثَنَا دَاوُدُ بْنُ أَبِي الْفُرَاتِ ، حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ بُرَيْدَةَ ، عَنْ يَحْيَى بْنِ يَعْمَرَ ، عَنْ عَائِشَةَ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهَا زَوْجِ النَّبِيِّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَتْ : سَأَلْتُ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ عَنِ الطَّاعُونِ فَأَخْبَرَنِي أَنَّهُ عَذَابٌ يَبْعَثُهُ اللَّهُ عَلَى مَنْ يَشَاءُ ، وَأَنَّ اللَّهَ جَعَلَهُ رَحْمَةً لِلْمُؤْمِنِينَ لَيْسَ مِنْ أَحَدٍ يَقَعُ الطَّاعُونُ فَيَمْكُثُ فِي بَلَدِهِ صَابِرًا مُحْتَسِبًا يَعْلَمُ أَنَّهُ لَا يُصِيبُهُ إِلَّا مَا كَتَبَ اللَّهُ لَهُ إِلَّا كَانَ لَهُ مِثْلُ أَجْرِ شَهِيدٍ

मैंने रसूलुल्लाह ﷺ से ताऊन के बारे में पूछा तो आप ﷺ ने फरमाया: ये एक अज़ाब है, अल्लाह तआला जिस पर चाहता है भेजता है, लेकिन अल्लाह तआला ने इस को मोमिनों के लिए रहमत बना दिया है, अगर किसी शख्स की बस्ती में ताऊन फैल जाए और वो सब्र के साथ अल्लाह की रहमत से उम्मीद लगाए हुए वहीं ठहरा रहे (ये सोचकर) कि होगा वही जो अल्लाह तआला ने किस्मत में लिखा है तो उसे शहीद के बराबर सवाल मिलेगा।
★सही बुखारी (3474)

एक और देखें:
قَالَ رَسُولُ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : الطَّاعُونُ شَهَادَةٌ لِكُلِّ مُسْلِمٍ
रसूलुल्लाह ﷺ ने फरमाया: ताऊन हर मुस्लिम के लिए शहादत है।
★सही बुखारी (5732)

★कुछ और रेफरेंस:
बुखारी (5733, 5734)
मुस्लिम (4941, 4944)
अबु दाऊद (3111)
अल-निसाई (1847, 3165)
इब्न ए माजा (2803, 2804)

यहां ये बात ध्यान रखें, कि कोई शख्स अल्लाह के बताए रास्ते पर अमल कर रहा है, और नबी ﷺ के हुक्म के मुताबिक़ उसी इलाके में रुका हुआ है और फिर अगर वो उस बीमारी में मर जाता है, तो वो अल्लाह की राह में मरा, इसलिए वो शहीद माना जाएगा। और अक्सर उलमा ताऊन के मसाईल को केवल ताऊन तक नहीं रखते हैं, बल्कि इसको उसूली तौर पर लेते हैं, मतलब उस दौर में ताऊन ऐसे महामारी की तरह फैलती थी तो जो हुक्म उस पर लगता था, वही हुक्म आज की भी ऐसी महामारी पर लगेगा जो उसी तरह लोगों में फैलती चली जाती हैं।

ये बात तो मैंने बीच में वैसी वज़ाहत के लिए बयान कर दी, अब आते हैं जमात के लिए मस्जिद में जाने के मसले की तरफ, इसमें भी पहले जमात की नमाज़ की अहमियत बता दूं, ये केवल एक हदीस से मुकम्मल वाज़ह हो जाएगी, देखें:

حَدَّثَنَا عُمَرُ بْنُ حَفْصٍ ، قَالَ : حَدَّثَنَا أَبِي ، قَالَ : حَدَّثَنَا الْأَعْمَشُ ، قَالَ : حَدَّثَنِي أَبُو صَالِحٍ ، عَنْ أَبِي هُرَيْرَةَ ، قَالَ : قَالَ النَّبِيُّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : لَيْسَ صَلَاةٌ أَثْقَلَ عَلَى الْمُنَافِقِينَ مِنَ الْفَجْرِ وَالْعِشَاءِ ، وَلَوْ يَعْلَمُونَ مَا فِيهِمَا لَأَتَوْهُمَا وَلَوْ حَبْوًا ، لَقَدْ هَمَمْتُ أَنْ آمُرَ الْمُؤَذِّنَ فَيُقِيمَ ، ثُمَّ آمُرَ رَجُلًا يَؤُمُّ النَّاسَ ، ثُمَّ آخُذَ شُعَلًا مِنْ نَارٍ فَأُحَرِّقَ عَلَى مَنْ لَا يَخْرُجُ إِلَى الصَّلَاةِ بَعْدُ

नबी करीम ﷺ ने फरमाया: मुनाफिक़ पर फजर और इशा की नमाज़ से ज़्यादा और कोई नमाज़ भारी नहीं और अगर उन्हें मालूम होता कि उन का सवाब कितना ज़्यादा है (और चल ना सकते) तो घुटनों के बल घसीट कर आते और मेरा तो इरादा हो गया था कि मुअज़्ज़िन से कहूं कि वो तकबीर कहे, फिर मैं किसी को नमाज़ पढ़ाने के लिए कहूं और खुद आग की चिंगारियां ले कर उन सब के घरों को जला दूं जो अभी तक नमाज़ के लिए नहीं निकले।
★सही बुखारी (657)
★कुछ और रेफरेंस:
मुस्लिम (1482)
अबु दाऊद (549, 550)
अल-निसाई (849)

ये नबी ﷺ की सख्ती थी जमात से नमाज़ पढ़ने की रगबत दिलाने के लिए, ऐसा नहीं था कि उन्हें आग लगानी थी, ऐसा होता तो वो लगा देते, उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था, बल्कि वो तो रहमतल्लिल आलमीन थे, पर ये जमात से पढ़ने और जमात को ऐसे ही छोड़ देने के बीच के फर्क की संगीनी थी, जो उनको वाज़ह करनी थी, ताकि उम्मत जमात की अहमियत और इसको ऐसे ही ज़ाया कर देने की गलती को पहचाने।

ये तो थी जमात की अहमियत, अब आते हैं अपनी असल बात की तरफ, कि क्या जमात किसी सूरत में छोड़ सकते हैं? तो मैं ये बता दूं कि इस महामारी के माहौल में मस्जिद जाने से हमारे ज़रिए वो कौन से काम हो सकते हैं, जिन पर नबी ﷺ ने खास तौर पर मस्जिद में आने पर ही नपसंदीदगी का इज़हार किया है, देखें:

حَدَّثَنَا سَعِيدُ بْنُ عُفَيْرٍ ، قَالَ : حَدَّثَنَا ابْنُ وَهْبٍ ، عَنْ يُونُسَ ، عَنِ ابْنِ شِهَابٍ ، زَعَمَ عَطَاءٌ ، أَنَّ جَابِرَ بْنَ عَبْدِ اللَّهِ ، زَعَمَ أَنّ النَّبِيَّ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ ، قَالَ : مَنْ أَكَلَ ثُومًا أَوْ بَصَلًا فَلْيَعْتَزِلْنَا أَوْ قَالَ فَلْيَعْتَزِلْ مَسْجِدَنَا وَلْيَقْعُدْ فِي بَيْتِهِ ،

नबी करीब ﷺ ने फरमाया: जो लहसुन या प्याज़ खाए हुए हो तो वो हम से दूर रहे या (ये कहा कि उसे) हमारी मस्जिद से दूर रहना चाहिए या उसे अपने घर में ही बैठना चाहिए।
★सही बुखारी (855)
★कुछ और रेफरेंस:
बुखारी (5452)
मुस्लिम (1253, 1254)
अबु दाऊद (3822)
अल-निसाई (709)

लेकिन यहां ये बात समझ लें कि आपको इस हदीस से ऐसा धोखा ना हो कि आप लहसुन और प्याज़ खाने को गलत समझने लगें, हज़रत उमर र० ने इसको भी क्लियर कर दिया, जो ऊपर मैंने आखिर में अल-निसाई का (709) नंबर रेफरेंस दिया है, उसमें हज़रत उमर र० ने हदीस की पूरी डिटेल बता कर कहा, कि जो उन दोनों को खाए, उसे चाहिए कि पका कर उनकी बदबू मार दे।
ऐसा उन्होंने इसलिए कहा, क्योंकि प्याज़ और लहसुन अपने आप में हराम नहीं है, बल्कि सारा मसला उसकी बदबू से बाकी नमाज़ियों को दिक्कत होने का था, गालिबन वो कच्ची खाकर आते होंगे। बहरहाल हज़रत उमर र० ने उस से यही फहम लिया, और सहाबा र० का फहम हमारी सोच से कहीं बेहतर है।
अब यहां आप एक बात पर गौर करें कि रसूलुल्लाह मुहम्मद ﷺ ने इस को पसंद नहीं किया कि कोई प्याज़ और लहसुन की बदबू के साथ मस्जिद में आए और नमाज़ियों के लिए दिक्कत खड़ी हो जाए, तो क्या वो इस बात को पसंद करेंगे कि कोरोना वायरस जैसी त्रासदी में आप एक दूसरे को उस परेशानी में मुब्तिला करें। लेकिन यहां ज़रा रुकें, बहुत से लोग ये भी कह रहे हैं कि हमें अल्लाह पर यक़ीन है, हमें कुछ फर्क नहीं पड़ेगा, अल्लाह की मर्ज़ी, वो हिफ़ाज़त करेगा! ये बात जज़्बाती तौर पर तो बहुत अच्छी लगती है, पर इसका शरीयत और हकीकत से इस बेपरवाही के तरीके के साथ कोई लेना देना नहीं है, अल्लाह पर मुक़म्मल तवक़्क़ल (यक़ीन) बेशक ईमान का हिस्सा है, लेकिन वो तवक़्क़ल कैसा और किस तरह होना चाहिए, ये भी हमें खुद नबी ﷺ बताएंगे ना! तो देखते हैं कि नबी ﷺ ने इस बारे में क्या फरमाया है:

حَدَّثَنَا أَبُو حَفْصٍ عَمْرُو بْنُ عَلِيٍّ، حَدَّثَنَا يَحْيَى بْنُ سَعِيدٍ الْقَطَّانُ، حَدَّثَنَا الْمُغِيرَةُ بْنُ أَبِي قُرَّةَ السَّدُوسِيُّ، قَال:‏‏‏‏ سَمِعْتُ أَنَسَ بْنَ مَالِكٍ يَقُولُ:‏‏‏‏ قَالَ رَجُلٌ:‏‏‏‏ يَا رَسُولَ اللَّهِ،‏‏‏‏ أَعْقِلُهَا وَأَتَوَكَّلُ أَوْ أُطْلِقُهَا وَأَتَوَكَّلُ قَالَ:‏‏‏‏ اعْقِلْهَا وَتَوَكَّلْ

एक शख्स ने अर्ज़ किया: अल्लाह के रसूल! क्या मैं ऊंट को पहले बांध दूं फिर अल्लाह पर तवक़्क़ल करूं या छोड़ दूं फिर तवक़्क़ल करूं? आप ने फरमाया: “इसे बांध दो, फिर तवक़्क़ल करो।
★जाम ए तिरमज़ी (2517)

इसका मतलब कि अपनी अक्ल को बंद करके अल्लाह पर यक़ीन नहीं करना है, बल्कि अपनी पूरी ज़िम्मेदारी अदा करने के बाद अल्लाह पर यक़ीन करना है, खाली यक़ीन भी कोई चीज़ नहीं, और खाली अपनी ज़िम्मेदारी को मुकम्मल समझ कर खुद की इसका पूरा क्रेडिट देना भी ठीक नहीं, बेशक जब तक अल्लाह ना चाहे कुछ नहीं हो सकता, लेकिन ये भी अल्लाह ही चाहता है, कि हम अपनी अक्ल का इस्तेमाल करें, तभी तो उसने हमें अक्ल दी है, और क़ुरआन में बार बार बल्कि पूरी दुनिया में सबसे ज़्यादा बार अगर अक्ल के इस्तेमाल पर ज़ोर देने वाली कोई किताब है तो वो क़ुरआन है। बहरहाल, तो हम अपनी अक्ल का इस्तेमाल करके ये जानने की कोशिश करें कि नबी ﷺ की बताए हुई हिदायात आखिर हमसे क्या कहना चाह रही हैं, और किस तरह इस मरहले में हमारी रहनुमाई कर रही हैं।

अब मैं आखरी बात रखूंगा, कि नबी ﷺ ने किन हालात में जमात के लिए मस्जिद में आने से मना किया है, और हुक्म दिया है कि अपने घरों में नमाज़ अदा करो, और खाली यहां तक नहीं बल्कि मुअज़्ज़िन को अज़ान के दौरान “हय्या अलस्सलाह (आओ नमाज़ की तरफ)” के अल्फ़ाज़ की जगह “अस्सलातु फिर्रिहाल (अपनी कयामगाहों में नमाज़ पढ़ो)” और “स’ल’वा फ़ी बुयूतिकुम (अपने घरों में नमाज़ पढ़ लो)” के अल्फ़ाज़ कहने का हुक्म दिया।
मुझे तहकीक के बाद हदीसों के मजमुओं से फिलहाल इसके कुल 38 रेफरेंस मिले, पर मैं यहां बस तीन रखूंगा बाकी के केवल रेफरेंस नंबर दे दूंगा। देखें:

حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ ، قَالَ : حَدَّثَنَا حَمَّادٌ ، عَنْ أَيُّوبَ ، وَعَبْدِ الْحَمِيدِ صَاحِبِ الزِّيَادِيِّ ، وَعَاصِمٍ الْأَحْوَلِ ، عَنْ عَبْدِ اللَّهِ بْنِ الْحَارِثِ ، قَالَ : خَطَبَنَا ابْنُ عَبَّاسٍ فِي يَوْمٍ رَدْغٍ ، فَلَمَّا بَلَغَ الْمُؤَذِّنُ حَيَّ عَلَى الصَّلَاةِ ، فَأَمَرَهُ أَنْ يُنَادِيَ الصَّلَاةُ فِي الرِّحَالِ ، فَنَظَرَ الْقَوْمُ بَعْضُهُمْ إِلَى بَعْضٍ ، فَقَالَ : فَعَلَ هَذَا مَنْ هُوَ خَيْرٌ مِنْهُ وَإِنَّهَا عَزْمَةٌ

इब्न अब्बास र० ने एक दिन हम को जुमा का खुतबा दिया, बारिश की वजह से उस दिन अच्छी खासी कीचड़ हो रही थी, मुअज़्ज़िन जब “حى على الصلاة” पर पहुंचा तो आप ने उस से “الصلاة في الرحال” कहने के लिए फरमाया, कि लोग नमाज़ अपनी कयामगाहों पर पढ़ लें, इस पर लोग एक-दूसरे को देखने लगे, इब्न अब्बास र० ने कहा कि मुझ से जो अफ़ज़ल थे, उन्होंने भी इसी तरह किया था और इस में शक नहीं की जुमा वाजिब है।
★सही बुखारी (616)

حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ يُوسُفَ ، قَالَ : أَخْبَرَنَا مَالِكٌ ، عَنْ نَافِعٍ ، أَنَّ ابْنَ عُمَرَ أَذَّنَ بِالصَّلَاةِ فِي لَيْلَةٍ ذَاتِ بَرْدٍ وَرِيحٍ ، ثُمّ قَالَ : أَلَا صَلُّوا فِي الرِّحَالِ ، ثُمَّ قَالَ إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ صَلَّى اللَّهُ عَلَيْهِ وَسَلَّمَ : كَانَ يَأْمُرُ الْمُؤَذِّنَ إِذَا كَانَتْ لَيْلَةٌ ذَاتُ بَرْدٍ وَمَطَرٍ يَقُولُ أَلَا صَلُّوا فِي الرِّحَالِ

अब्दुल्लाह बिन उमर र० ने एक ठंडी और बरसात की रात में अज़ान दी, फिर यूं पुकार कर कह दिया: “ألا صلوا في الرحال‏”, कि लोगों! अपनी कयामगाहों पर ही नमाज़ पढ़ लो, फिर फरमाया कि नबी करीम ﷺ सर्दी व बारिश की रातों में मुअज़्ज़िन को हुक्म देते थे कि वो ऐलान कर दे कि लोग अपनी कयामगाहों पर ही नमाज़ पढ़ लो।
★सही बुखारी (666)

حَدَّثَنَا مُسَدَّدٌ ، قَالَ : حَدَّثَنَا إِسْمَاعِيلُ ، قَالَ : أَخْبَرَنِي عَبْدُ الْحَمِيدِ صَاحِب الزِّيَادِيِّ ، قَالَ : حَدَّثَنَا عَبْدُ اللَّهِ بْنُ الْحَارِثِ ، ابْنُ عَمِّ مُحَمَّدِ بْنِ سِيرِينَ قَالَ ابْنُ عَبَّاسٍ لِمُؤَذِّنِهِ فِي يَوْمٍ مَطِيرٍ : إِذَا قُلْتَ أَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ اللَّهِ فَلَا تَقُلْ حَيَّ عَلَى الصَّلَاةِ ، قُلْ صَلُّوا فِي بُيُوتِكُمْ فَكَأَنَّ النَّاسَ اسْتَنْكَرُوا ، قَالَ : فَعَلَهُ مَنْ هُوَ خَيْرٌ مِنِّي إِنَّ الْجُمْعَةَ عَزْمَةٌ وَإِنِّي كَرِهْتُ أَنْ أُحْرِجَكُمْ فَتَمْشُونَ فِي الطِّينِ وَالدَّحَضِ

अब्दुल्लाह बिन अब्बास र० ने अपने मुअज़्ज़िन से एक दफा बारिश के दिन कहा कि “أشهد أن محمدا رسول الله” के बाद “حى على الصلاة‏” (नमाज़ की तरफ आओ) ना कहना बल्कि ये कहना कि “صلوا في بيوتكم” (अपने घरों में नमाज़ पढ़ लो), लोगों ने इस बात पर ताज्जुब किया तो आप ने फरमाया कि इसी तरह मुझ से बेहतर इंसान (रसूलुल्लाह ﷺ) ने किया था, बेशक जुमा फर्ज़ है और मैं मकरूह जानता हूं कि तुम्हें घरों से बाहर निकाल कर मिट्टी और कीचड़ फिसलवान में चलाऊं।
★सही बुखारी (901)
★कुछ और रेफरेंस:
बुखारी (632, 668)
मुस्लिम (1600, 1601, 1602, 1603, 1604, 1605, 1606, 1607, 1608, 1609)
तिरमज़ी (409)
अबु दाऊद (1059, 1060, 1061, 1062, 1063, 1065, 1066)
अल-निसाई (655, 855)
इब्न ए माजा (936, 937, 938, 939)
मुसनद अहमद (1305, 2474, 2475, 2476, 2479, 2480, 2481, 2482, 2724)

तो भाईयों! रसूलुल्लाह ﷺ ने तो उम्मत को सर्द रात और बारिश की दिक्कत में घर में नमाज़ पढ़वाई, ये कोरोना तो उससे कहीं ज़्यादा बड़ी दिक्कत है, इसके नुक़सानात किस लेवल तक हो सकते हैं उसको बताने की ज़रूरत नहीं, आपके सामने चीन और इटली जैसी मिसालें हैं, मेरी आपसे इल्तिजा है कि इस पर गौर करें, मैंने अपने इल्म की हद तक हर बात रेफरेंस के साथ रख दी, मैं बताने की ज़िम्मेदारी से बरी हो चुका हूं, लेकिन इस पर ग़ौरो फिक्र करने की ज़िम्मेदारी अब आप पर आ गई है, क्योंकि अल्लाह ने हर शख्स को अक्ल से नवाज़ा है, लेकिन ये बात ध्यान रखें कि इस्लाम दीन-ए-फितरत है और इस दीन पर अमल करना बहुत आसान है, इसको शिद्दतों से सख्त और अप्राकृतिक या ऐसा ना बना दें कि वो फितरत के खिलाफ महसूस होने लगे।
हां! लेकिन आखिर में ये भी समझ लें, कि अपनी सावधानियां बरतने के बाद अल्लाह पर मुकम्मल भरोसा कायम कर दें, कि फिर उसका हर फैसला कबूल है, जैसा वो बेहतर समझे, क्योंकि वो बेहतर जानता है, हम नहीं जानते, बस इन आयात के साथ अपनी बात को खत्म करूंगा, अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाता है:

وَ اِنۡ یَّمۡسَسۡکَ اللّٰہُ بِضُرٍّ فَلَا کَاشِفَ لَہٗۤ اِلَّا ہُوَ ۚ وَ اِنۡ یُّرِدۡکَ بِخَیۡرٍ فَلَا رَآدَّ لِفَضۡلِہٖ ؕ یُصِیۡبُ بِہٖ مَنۡ یَّشَآءُ مِنۡ عِبَادِہٖ ؕ وَ ہُوَ الۡغَفُوۡرُ الرَّحِیۡمُ

और अगर अल्लाह तुमको किसी तकलीफ़ में पकड़ ले तो उसके सिवा कोई नहीं जो उसको दूर कर सके, और अगर वह तुमको कोई भलाई पहुँचाना चाहे तो उसके फ़ज़्ल को कोई रोकने वाला नहीं, वह अपना फ़ज़्ल अपने बंदों में से जिसको चाहता है देता है, और वह बख़्शने वाला, मेहरबान है।
★क़ुरआन (10:107)

बाकी ये याद रखें कि अल्लाह अपना फज़्ल उसी को देता है जो उस की राह में कोशिशें करता है, कोशिश ज़रूरी है, ये भी अल्लाह क़ुरआन में फरमाता है, देखें:

وَ الَّذِیۡنَ جَاہَدُوۡا فِیۡنَا لَنَہۡدِیَنَّہُمۡ سُبُلَنَا ؕ وَ اِنَّ اللّٰہَ لَمَعَ الۡمُحۡسِنِیۡنَ

और वो लोग जिन्होंने हमारी राह में कोशिशें की, हम ज़रूर उन्हें अपने रास्ते की हिदायत दे देंगे, बेशक अल्लाह नेकोकारों के साथ है।
★क़ुरआन (29:69)

अल्हम्दुलिल्लाह!
बाकी मैं महज़ एक आम इंसान हूं, हक़ बात तक पहुंचने के लिए बस खालिस होकर ग़ौरो फिक्र कर सकता हूं, बेशक अल्लाह सब से बेहतर जानने वाला है, उस से दुआ है कि वो हम सब की राह-ए-हक़ की तरफ रहनुमाई फरमाए।
आमीन

Facebook Comments

Share this post
  • 151
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    151
    Shares

I'm a Writer, trying to deliver the truth with meaningful words.

Muhammad Amir Ansari
I'm a Writer, trying to deliver the truth with meaningful words.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *